रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773 ई.)

रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773 ई.) –
18 मई, 1773 ई. को लार्ड नार्थ ने कॉमन्स सभा में ईस्ट इंण्डिया कम्पनी रेग्यूलेटिंग बिल प्रस्तुत किया, जिसे कॉमन्स सभा ने 10 जून को और लार्ड सभा ने 19 जून को पास कर दिया। यह 1773 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट के नाम से प्रसिद्ध है। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में सुधार लाना था। सी.एल.आनन्द ने इस सम्बन्ध में लिखा है, यद्यपि इससे कम्पनी की शासन-प्रणाली की बुराइयाँ बूरी तरह दूर नहीं हो पाई, फिर भी उस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इस एक्ट में कम्पनी की दिशा में आवश्यक सुधार हुआ। इतना ही नहीं, यह एक्ट एंग्लो भारतीय प्रशासनिक ढाँचे की आधारशिला भी बना रहा।

रेग्यूलेटिंग एक्ट के पारित होने के कारण –
ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा दीवानी की प्राप्ति और कुछ क्षेत्रों पर अधिकार के कारण इंग्लैण्ड की सरकार ने भारतीय मामलों में विशेष रूचि लेनी शुरू कर दी। पार्लियामेन्ट के सदस्यों ने यह अनुभव किया कि कम्पनी का शासन बहुत दोषपूर्ण है। अतः उसके तथा राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखते हुए उस पर संसद का नियंत्रण स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए लार्ड नार्थ की सरकार ने 19 जून, 1773 ई. को ईस्ट इण्डिया कम्पनी रेग्यूलेटिंग एक्ट पास किया। इस एक्ट के बार में जी.एन. सिंह ने लिखा है, यह एक्ट महान संवैधानिक महत्ता का है, क्योंकि इसने पहली बार संसद को यह अधिकार दिया कि वह जिस तरह की चाहे, उस तरह की सरकार स्थापित करने का आदेश भारत में दे सकती थी, जो अधिकार अभी तक कम्पनी का बना हुआ था और क्योंकि संसदीय संविधियों की लम्बी परम्पराओं में से प्रथम है, जिसने भारत में सरकार का स्वरूप बदल दिया। रेग्यूलेटिंग एक्ट के पारित होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे – >>
(1) कम्पनी का भारतीय प्रदेशों पर अधिकार और संविधानिक कठिनाइयाँ-
ईस्ट इण्डिया कम्पनी मौलिक रूप से एक व्यापारिक संस्था थी, लेकिन प्लासी और बक्सर के युद्धों में विजय प्राप्त होने के परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार और उड़ीसा में उसका राज्य स्थापित हो गया था। दूसरे शब्दो में, वह इन सूबों की वास्तविक शासक बन गई थी। ब्रिटिश कानून के अनुसार कोई भी प्राइवेट संस्था या व्यक्ति ब्रिटिश सम्राट की आज्ञा के बिना किसी विदेशी भूभाग पर अधिकार नहीं कर सकता था। अतः कम्पनी के क्षेत्राधिकार ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष एक अनोखा तथा विरोधी प्रश्न खडा कर दिया। इस संवैधानिक समस्या को हल करने के लिए दो ही उपाय थे-या तो ब्रिटिश सरकार कम्पनी के भारतीय प्रदेशों को अपने अधिकार में ले ले या कम्पनी को अपने नियंत्रण में पूर्णतया मुक्त कर दे। राजनीतिक दृष्टिकोण से ये दोनों ही मार्ग त्रुटिपूर्ण थे। यदि ब्रिटिश सरकार कम्पनी के भारतीय प्रदेशों को अपने अधिकार में ले लेती, तो इससे कोई प्रकार की राजनीतिक उलझनें उत्पन्न हो सकती थीं। विशेषतया इसलिए कि कम्पनी के अधिकार यह तर्क दने लगे थे कि उन्होंने मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा आदि प्रदेशों की केवल दीवानी ही प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त कम्पनी इन प्रदेशों का शासन मुगल सम्राट के दीवान की हैसियत से कार्य करना उसके सम्मान के विरूद्ध था। कम्पनी के निजी प्रदेशों पर अधिकार करना उस समय की सम्पत्ति सम्बन्धी परम्परा के भी प्रतिकूल था।
ईस्ट इण्टिया कम्पनी एक साधारण कम्पनी न होकर पूर्वी एशिया के ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्व करती ती। बर्क के शब्दों में, ईस्ट इण्डिया कम्पनी ब्रिटिश वाणिज्य के विस्तार के लिए बनाई गई एक व्यवसायी संस्था (कम्पनी)मात्र प्रतीत नहीं होत थी, अपितु वस्तुतः इस राज्य की पूर्व में भेजी गई सम्पूर्ण शक्ति और प्रभुसत्ता का प्रत्यायोजन (Delegation) था। कुव्यवस्था के एक साम्राज्यवादी देश के नाम से इंग्लैण्ड की बदनामी होने का भी भय था। अतः इस संवैधानिक समस्या को ब्रिटिश सरकार ने एक एक्ट के द्वारा सुलझना ही उचित समझा।
(2) बंगाल की जनता की दुर्दशा-
द्वैध शासन व्यवस्था के कारण बंगाल में शासकीय अव्यवस्था फैल गई और कम्पनी के कर्मचारियों ने लूट-मार आरम्भ कर दी, जिसके कारण वहाँ के लोगों को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा और उनकी स्थिति दयनीय हो गई। अलफ्रेड लायल लिखते हैं, मजिस्ट्रेसी, पुलिस, राजस्व अधिकार भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं पर आधारित थे और विरोधी हितों के काम कर रहे थे। वे एक शासन के अधीन नहीं थे, तथा कुशासन के लिए एक-दूसरे से ईर्ष्या करते थे। देश में कोई कानून नहीं था तथा न्याय नाममात्र का था। रिचर्ड बेचर ने लिखा है, अंग्रेजों को यह जानकर दुःख होगा कि जब से कम्पनी के पास दीवानी अधिकार आए है, बंगाल के लोगों की दशा पहले की अपेक्षा अधिका खराब हो गई है। सर ल्यूयिश ने लिखा है, सन् 1765 ई. से लेकर 1772 ई. तक ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन इतना दोषपूर्ण एवं भ्रष्ट रहा है कि संसार-भर की सभ्य सरकारों में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता। उस समय अंग्रेजी नवाबों ने बहुत अधिक भ्रष्टाचार फैला रखा था। ऐसे समय में 1770 ई. में बंगाल मे एक भयंकर अकाल पड़ा, जिसे कम्पनी सम्भाल नहीं सकी। कीथ के अनुसार, इस दुर्भिक्ष में बंगाल की 1/5 जनसंख्या नष्ट हो गई, परन्तु आबादी के इधर-उधर भाग जाने के कारण कम्पनी को जो घाटा हुआ, उसकी पूर्ति कम्पनी ने दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं पर दाम बढ़ाकर और टैक्स बढ़ाकर की। लैकी के अनुसार, इसके पूर्व भारतीयों को इतने बुद्धिमत्तापूर्ण, खोजपूर्ण तथा कठोर अत्याचारपूर्ण अनुभव नहीं हुए थे जो जिले धनी आबादी वाले और समृद्धिशाली थे, अन्ततः वे सब के सब पूर्णरूप से जनसंख्या रहित कर दिए गए। चेथम के अनुसार, भारत में आंतरिक विषमताओं का इतना अधिक विस्तार हुआ, जितना की पृथ्वी एवं आकाश का अन्तर। अतः बंगाल की जनता बहुत दुःखी हो गई और ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया।
(3) द्वैध शासन व्यवस्था-
1765 ई. में लार्ड क्लाइव ने बंगाल में द्वैध शासन व्यवस्था स्थापित की
थी। यह व्यवस्था बहुत दोषपूर्ण थी, क्योंकि इसमें कम्पनी तथा नवाब दोनों में से किसी ने भी शासन प्रबन्ध की जिम्मेवारी अपने ऊपर नहीं ली थी। परिणामस्वरूप, बंगाल में अराजकता एवं अव्यवस्था फैल गई और कर्मचारियों ने लूट-मार प्रारम्भ कर दी। होरेस वालपोल और लूट का ऐसा दृश्य हमारे सामने खोला गाय है, जिसे देखकर हम काँप उठते हैं। सोने के लोभ में हम स्पेनी हैं। उसकी प्राप्ति के सूक्ष्म तरीकों में हम दक्ष हैं। वेरस्ट ने अपनी पुस्तक गवर्नर ऑफ बंगाल (1767-69) में लिखा है कि, द्वैध शासन के परिणामस्वरूप बंगाल में अत्याचारी शासन कायम हो गया। ल्यूकस ने लिखा है, 1765 से लेकर 1722 ई. तक ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन इतना दूषित तथा भ्रष्ट रहा कि संसार की सभ्य सरकारों में उसका कोई उदाहरण नहीं मिलता है। संक्षेप में, द्वैध शासन के परिणामस्वरूप बंगाल में अराजकात और अव्यवस्था फैल गई थी। कुशासन अपनी चरम सीमा पर था, व्यभिचार का बोल-बाला था। दमन और शोषण आम बात थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार के लिए कम्पनी के कार्यों में हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो गया था।
(4) कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा शोषण और धन जमा करना-
भारत में काम करने वाले कम्पनी के कर्मचारियों के वेतन कम थे, लेकिन उन्हें निजी व्यापार करने का अधिकार था। अतः वे कुछ रिश्वत लेकर देशी व्यापारियों का माल अपने नाम से मँगवा लेते थे, जिससे देशी व्यापारियों को चुँगी नहीं देनी पड़ती थी। कम्पनी के कर्मचारी देशी व्यापारियों तथा जनता को कोई काम निकालने के लिए भेंट की खूब स्वीकार करते थे। इस प्रकार, कम्पनी के कर्मचारी अनुचित उपायों से धन संग्रह करके बहुत धनवान बन गई थे और इंग्लैण्ड जाकर भारत के नवाबों की तरह विलासितापूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। इसलिए कम्पनी के इन कर्मचारियों को ब्रिटिश जनता चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी नवाब कहती थी।
कम्पनी के कर्मचारी बहुत निर्दयी तथा लालची थे। वे धन कमाने के लिए अनुचित उपयों का सहारा लेते थे। वे गरीब भारतीयों से न केवल जबरदस्ती रूपया वसूल किया करते थे, अपितु निर्दोष प्रजा पर बहुत अत्यचार भी करते थे. प्रत्येक कर्मचारी का यह उद्देश्य था कि वह भारतीयों से अधिक से अधिक धन लूटकर जल्द से जल्द इंग्लैण्ड चला जाए। जी.एन. सिंह द्वारा उद्धूत लैकी के शब्दों में, भारतीयों ने इनता चालाक और दृढ अत्याचारी शासक इसके पूर्व कभी नहीं देखा था। ऐसा देखा जाता था कि अंग्रेज व्यापारियों के आ जाने पर गाँव खाली हो जाते थे, दुकानें बन्द हो जाती थीं और सड़कें भयभीत शरणार्थियों से भर जाती थीं।
1770 ईं. में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, जिसके कारण लोगों के कष्ट बढ़ गए और जनता की स्थिति और दयनीय हो गई। पुन्निया ने लिखा है कि, कम्पनी के कर्मचारी इतने निर्दय और निर्लज्ज व लोभी थे कि उन्होंने गरीब जनता के कष्टों से भी लाभ उठाया और अकाल की दशाओं का उपयोग नीजि अर्थ प्राप्ति के लिए किया। जी.एन. सिंह ने लिखा है, कम्पनी के कर्मचारी इतने निर्लज्ज तथा लालची थे कि धन बटोरते समय वे अकाल पीड़ित तथा दरिद्र लोगों की विपत्तियों की भी परवाह नहीं करते थे।
कम्पनी के ये कर्मचारी अपार धन लेकर इंग्लैण्ड में संसद के निर्वाचन में व्यय करते थे और वहाँ के राजनीतिक वातावरण को दूषिक करते थे। मैकला ने लिखा है, मानवीय मन उनके धन बटरोने के उपायों से काँप उठता था, जबकि मितव्ययी लोग उनके अपव्यय से आश्चर्यचकित रह जाते थे। इसलिए ब्रिटिश जनता उनसे ईर्ष्या करती थी और कम्पनी के मामलों की नीतियों पर कुछ नियंत्रण करना आवश्यक समझा।
(5) कम्पनी की पराजय-
1769 ई. में मैसूर के शासक हैदरअली ने कम्पनी को पराजित कर दिया। उसने मद्रास सरकार से अपनी शर्तें बलपूर्वक मनवा लीं। इस पराजय से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा। अतः इंग्लैण्ड की सरकार और वहाँ की जनता ने कम्पनी की नीतियों पर कुछ नियंत्रण करना आवश्यक समझा।
(6) कम्पनी का दिवालियापन-
1765 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त करते समय क्लाइव ने यह अनुमान लगाया था कि बंगाल का कुल राजस्व 40 लाख पौण्ड होगा और खर्च आदि निकालकर कम्पनी को 1,65,000 पौण्ड की वार्षिक बचत होगी। इससे उत्साहित होकर कम्पनी के अधिकारियों ने 1766 ई. में लाभांश की दर (Dividend) 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत और 1767 में 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 121/2 प्रतिशत कर दी। पार्लियामेन्ट के सदस्य भी कम्पनी के धन-धान्य का कुछ भाग प्राप्त करना चाहते थे। अतः ब्रिटिश सरकार और कम्पनी के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार कम्पनी ने ब्रिटिश सरकार को भारतीय प्रदेशों पर अधिकार जमाये रखने के बदले में चार लाख पौण्ड वार्षिक खिराज के रूप में देना स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने यह रकम कुछ वर्षों तक अदा की, परन्तु बाद में उसकी स्थिति खराब हो गई कि इस रकम को प्रतिवर्ष अदा नहीं कर सकी। यहाँ तक कि उसने 1773 ई. में ब्रिटिश सरकार से 10 लाख पौण्ड के ऋण की प्रार्थना की। इससे सरकार को मौका मिला कि वह उससे कार्यों की जाँच-पड़ताल करे।
(7)  1818 ई. के संवैधानिक सुधारों पर रिपोर्ट-
रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 ई. के कारणों पर प्रकाश डालते हुए संवैधानिक सुधार विषयक रिपोर्ट में कहा गया था कि, कम्पनी का दिवालायान संसदीय हस्तक्षेप का तात्कालिक कारण था, लेकिन अधिक महत्त्वपूर्ण कारण अंग्रेजों में बढ़ती हुई भावना थी कि राष्ट्र सुदूर देश में शासन करने के प्रयोग की सफलता का पूर्ण उत्तदायित्व अने ऊपर लें और यह देखें के विदेशियों पर शासन समुचित ढंग से हो रहा है।
(8) संसदीय जाँच और लार्ड नार्थ का रेल्गूयलेटिंग बिल-
ब्रिटिश सरकार ने ऊपर लिखे कारणों से विवश होकर कम्पनी के कार्यों की जाँच के लिए दो संसदीय समितियाँ नियुक्त कीं, इनमें से एक कमेटी और सीक्रेट कमेटी थी। सलेक्ट कमेटी ने 12 और सीक्रेट कमेटी ने 6 रिपोर्ट पेश की, जिनमें कम्पनी प्रशासन की बहुत अधिक आलोचना की गई थी। इन रिपोर्टों के आधार पर प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ ने कम्पनी के मामलों को नियमित करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी बिल तैयार किया और 18 मई, 1773 ई. को ब्रिटिश संसद के सामने रखा।
बिल को पेश करते समय लार्ड नार्थ ने संसद सदस्यों को सम्बोधित करते हुए कहा था, मेरे बिल की प्रत्येक धारा का उद्देश्य कम्पनी के शासन को सुदृढ़, सुव्यवस्थित और सुनिश्चित बनाना है और ऐसा केवल कम्पनी के भले के लिए ही नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए भी अति आवश्यक है। एडमण्ड बर्क ने कम्पनी के कार्यों की हिमायत करते हुए इस बिल की कटु आलोचना की। उसने इस सम्बन्ध में यह शब्द कहे, ब्रिटिश सरकार का कम्पनी के कार्यों में हस्तक्षेप नीति विरूद्ध, विवेकहीन होने के साथ-साथ देश की न्यायसंगता तथा विधान के भी प्रतिकुल है। इसके अतिरिक्त यह बिल राष्ट्र द्वारा दिए गए अधिकार, न्याय, परम्परा और राष्ट्र के प्रति जनता के विश्वास पर आधात है।
परन्तु ब्रिटिश संसद ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और बहुत अधिक बहुतमत से इस बिल को पास कर दिया। बिल पास होने पर  रेग्यूलेटिंग एक्ट कहलाया। रेग्यूलेटिंग एक्ट के अथिरिक्त एक और एक्ट पास किया गया, जिसके अनुसार कम्पनी को 4 प्रतिशत वार्षिक व्याज की दर से 14 लाख पौण्ड ऋण देने की व्यवस्था की गई और उसे 6 प्रतिशत से अधिक लामांश-दर देने की मनाही कर दी गई। संसद ने कम्पनी से 4 लाख पौण्ड वार्षिक की धनराशि भी लेनी बन्द कर दी।   
रेग्यूलेटिंग एक्ट की मुख्यधाराएँ उपबंध –

प्रेसीडेन्सियों का शासन-

1773 ई. के पूर्व बंगाल, मद्रास और बम्बई की प्रेसीडेन्सियाँ एक-दूसरे से स्वतंत्र थीं। इस एक्ट के द्वारा बंगाल के गवर्नर को भारत का गवर्नर जनरल बा दिया गया और बम्बई तथा मद्रास की प्रेसीडेन्सियों को उसके अधीन कर दिया गया। बंगाल के गवर्नर जनरल को बम्बई और मद्रास की सरकारों काम-काज पर निगारनी रखने तथा आवश्यकतानुसार उनको हुक्म देने का अधिकार दिया गया। बंगाल के गवर्नर जनरल की अनुमित के बिना बम्बई और मद्रास की प्रेसीडेन्सियों को किसी भी शक्ति के साथ युद्ध एवं सन्धि करने का अधिकार नहीं थाय वह आवश्यकता पड़ने पर बम्बई और मद्रास के गवर्नर तथा उसकी कौंसिल को निलम्बित या मुअत्तिल कर सकता था।

गवर्नर जनरल की परिषद् की स्थापना-
गर्वनर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की एक परिषद् की स्थापना कि गई। इस एक्ट के वारेन हेस्टिंग्ज को गर्वनर जनरल का पद प्रदान किया गया और परिषद् के चार अन्य सदस्यों के लिए बारवेल, फ्रांसिस, क्लेवरिंग तथा मॉनसन आदि के नामों का उल्लेख किया गया था। परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित किया, परन्तु संचालक मण्डल की सिफारिश पर सम्राट द्वारा किसी भी समय उन्हें हटाया जा सकता था। परिषद् के रिक्त स्थानों की पूर्ति का अधिकार संचालक मण्डल को दे दिया गया।
परिषद् की कार्यविधि के सम्बन्ध में यह नियम बनाया गया था कि इसमें प्रस्तुत होने वाले मामलों पर निर्णय बहुमत के आधार पर होगों। गवर्नर जनरल को अपनी परिषद् के फैसले को मानना पड़ता था। वह अपनी परिषद् के फैसलों का उल्लंघन नहीं कर सकता था। गवर्नर जनरल केवल उसी समय अनपा निर्णायक मत दे सकता, जबकि परिषद् के सदस्यों के मत दो बराबर भागों में बँट जाएंगे। चूँकि परिषद् के सदस्यों की संख्या चार थी, इसलिए यदि तीन सदस्य गवर्नर जनरल के विरूद्ध संगठित हो जाते तो वे उसकी इच्छा के खिलाफ निर्णल लेकर मनमान कर सकते थे और वह बुहत के निर्णय की उपेक्षा नहीं कर सकता था। गवर्नर जनरल का वार्षिक वेतन 25000 पौण्ड तथा परिषद् के प्रत्येक सदस्य का वेतन 10000 पौण्ड निर्धारित किया गया।

कानून बनाने का अधिकार-
गवर्नर जनलर और उसकी परिषद् को कम्पनी के तमाम प्रदेशों के लिए नियम और अध्यादेश बनाने का अधिकार दिया गया, किन्तु उन्हें लागू करने से पूर्व अंग्रेज सरकार की अनुमति प्राप्त कनरा आवश्यक कर दिया गया। ब्रिटिश सम्राट और उसकी कौंसिल को इन अध्यादेशों तथा नियमों को रद्द करने का अधिकार था।
ब्रिटिश सरकार का कम्पनी पर नियंत्रण बढ़ाना-
कम्पनी को ब्रिटिश सम्राट के पूर्ण नियंत्रण में ले लिया गया। कम्पनी के कर्मचारियों, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तथा समिति के सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार इंग्लैण्ड के सम्राट को प्राप्त हुआ। कम्पनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने के लिए इस एक्ट द्वारा यह भी निश्चित कर दिया गया कि भारत के राजस्व से सम्बन्धित समस्त मामलों की रिपोर्ट कम्पनी के डाइरेक्ट ब्रिटिश वित्त विभाग के अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत करेंगे और सैनिक तथा राजनीतिक कार्यों की रिपोर्ट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के समक्ष रखेंगे। इस प्रकार, ब्रिटिश संसद को एक व्यक्तिगत निगम के मामलें में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया।
कम्पनी की इंग्लैण्ड स्थिति शासकीय व्यवस्था में परिवर्तन-
पहले उन व्यक्तियों को कम्पनी के संचालकों (डायरेक्टर्स) को चुनने का अधिकार था, जिनके पास कम्पनी के 500 पौण्ड के शेयर थे। परन्तु इस एक्ट के अनुसार यह निश्चित कर दिया गया कि कम्पनी के संचालकों के चुनाव में वही मत देने का अधिकारी होगा, जिसके पास एक हाजर पौण्ड के शेयर होंगे। जिन व्यक्तियों के पास 3, 6 व 10 हजार पौण्ड मूल्य के शेयर थे, उन्हें क्रमशः 2, 3 और 4 मत देने का अधिकार दिया गया। डायरेक्टरों की अवधि पहले एक वर्ष थी, अब चार वर्ष कर दी गई और साथ ही संचालक मण्डल (Court of Dirfectors) के एक चौथाई सदस्यों को प्रति वर्ष रिटायर होने की व्यवस्था कर दी गई। इस एक्ट में यह भी निश्चित कर दिया गया कि एक ही सदस्य को दुबारा चुने जाने के पूर्व एक वर्ष का अवकाश आवश्यक होगा।
बंगाल में सुप्रीटकोर्ट अथवा सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना-
इंग्लैण्ड के सम्राट को 1773 ई. के एक्ट के अनुसार फोर्ट विलियम के स्थान पर सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडिकेचर नामक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना का अधिकार दिया गया। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य 3 न्यायाधीश थे। न्यायाधीशों की नियुक्ति इंग्लैण्ड के सम्राट के द्वारा की जाती थी, वही उन्हें पदच्युत भी कर सकता था। मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए सर एलिंग इम्पे के नाम का उल्लेख किया गया था। मुख्य न्यायाधीश का वार्षिक वेतन 8,000 पौण्ड और अन्य न्यायाधीशों का 6,000 पौण्ड निर्धारित किया गया। सुप्रीम कोर्ट को कम्पनी के क्षेत्राधिकार में रहने वाले अंग्रेजों और कम्पनी के कर्मचारियों के दीवानी, फौजदारी, धार्मिक और जल सेना सम्बन्धी मुकदमें सुनने का अधिकार दिया गया। इसके फौजदारी क्षेत्राधिकार से गवर्नर जनरल तथा उसकी परिषद् के सदस्य बाहर थे। यदि वे कोई अपराध करतें, तो इंग्लैण्ड में सम्राट के न्यायालयों में उनकी सुनावई तथा दण्ड देने की व्यवस्था की गई। गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् द्वारा निर्मित सभी नियमों, अध्यादेशों तथा कानूनों की स्वीकृति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवश्यक थी। इसके लिए हर कानून और न्यायालय में रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता था अर्थात् सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी उन कानूनों और निर्णयों को लागू करने से पहले लेना आवश्यक था। न्यायालय में अंग्रेज जूरी की व्यवस्था की गई थी। इसके निर्णय के विरूद्ध परिषद् सम्राट के पास अपील की जा सकती थी।
उच्च अधिकारियों का नियंत्रण-
इस एक्ट के अनुसार कम्पनी के उच्च पदाधिकारियों को अच्छे वेतन देने की व्यवस्था की गई, जिससे कि वे घूँसखोरी या भ्रष्टाचार की ओर न झुंकें। इतना हीं नहीं, उन्हें भारतीय राजाओं तथा लोगों से रिश्वत या भेंट लेने की मनाही कर दी गई। कम्पनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार पर कठोर नियंत्रण स्थापित किय गया तथा निजी व्यापार करना दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया। गवर्नर जनरल, परिषद् के सदस्य और सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीशों को निजी व्यापार करने से रोक दिया गया। अपराधियों को कड़ा आर्थिक दण्ड देने की व्यवस्था की गई। सार्वजनिक सम्पत्ति का गबन करने वाले और कम्पनी को धोखा देने वालों को जुर्माना और सजा देने की व्यवस्था की गई।

रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोष –
रेग्यूलेटिंग एक्ट का उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में आवश्यक सुधार करना था अर्थात् इसका उद्देश्य उस बुराइयों को दूर करना था, जो कम्पनी के शासन में आ गई थीं। लार्ड नार्थ ने संसद में बिल पेश करते समय स्वयं कहा था, मेरे इस बिल की प्रत्येक धारा का उद्देश्य कम्पनी के प्रशासन को सुदृढ़, सुव्यवस्थित तथा सुनिश्चित बनाना है। अतः इस एक्ट का उद्देश्य स्तुति योग्य था। लार्ड चाथम के शब्दों में, इसका उद्देश्य कम्पनी के शासन का सुधार था।
इस एक्ट में अनेक दोष थे, जिसके कारण कम्पनी का शासन सुचारू रूप से संचालित नहीं हो सका। इसके पारित होने के पश्चात् हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था, यह कानून एक कठिन समस्या को हल करने का सच्च प्रयत्न था, लेकिन सुधार लेने के तरीके में पार्लियामेन्ट ने जल्दबाजी से काम लिया और लोगों ने असंयम से। वास्तव में जल्दबाजी में यह एक्ट पारित किया गया था, जिसके कारण इसमें अनेक दोष रह गए थे। 1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट को विद्वानों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखा है। बाउटन राउज के शब्दों में, इस अधिनियम का उद्देश्य उत्तम था, परन्तु इसके द्वारा जिस पद्धति की स्थापना की गई थी वह त्रुटिपूर्ण थी।
थॉमसन और गैरेट के मतानुसार, यह एक्ट असामयिक था और इसकी रचना करते समय बंगाल की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया था। इसकी वाक्य-रचना भी दोषपूर्ण तथा अस्पष्ट थी, जिसके कारण इसके द्वारा स्थापित की गई शासकीय संस्थाओं में झगड़े होने अनिवार्य थे। पुन्निया के शब्दों में, रेग्यूलेटिंग एक्ट भारतीय मामलों के विषय में अपने ढंग का पहला अधिनियम था, इसलिए इसमें जो त्रुटियाँ रहीं, उसका प्रमुख कारण इसके बनाने वालों की अनुभव शून्यता थी। रॉबर्ट्स ने इसे, एक अधूरा उपाय, जिसमें कई बातें अनर्थकारी रूप से अस्पष्ट थीं, बताकर इसकी निन्दा की। डोडेविल के शब्दों में, यह विरोधाभासों और अनभिज्ञता से भरा हुआ था।
श्री जी.एन. सिंह ने इसके बारे में लिखा है, इसकी अपूर्णता का मुख्य कारण यह था कि संसद के सामने जो समस्या हल करने की थी, वह नये ही ढंग की थी। वह अंग्रेजों का सौभाग्य था कि इसकी अनेक और गम्भीर त्रुटियाँ घातक सिद्ध नहीं हुई। 1818 के भारतीय संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट में इस एक्ट की आलोचना इन शब्दों में की गई, इसके (1773 के अधिनियम के) द्वारा एक ऐसा महाराज्यपाल बनाया गया, जो अपनी ही परिषद् के सम्मुख अशक्त थे, एक ऐसी कार्यपालिका बनाई गई, जो सर्वोच्च न्यायाल के सम्मुख अशक्त थी और यह सर्वोच्च-न्यायालय देश की शांति और कल्याण की जिम्मेदारी से मुक्त था, यह व्यवस्था एक महान् व्यक्ति की प्रतिभा और धैर्य के कारण ही काम दे पाई। वस्तुतः इन एक्ट में अनेक दोष रह गए थे, जो कि निम्नलिखित हैं- >
गर्वनर जनरल का परिषद् की दया पर निर्भर होना-
रेग्यूलेटिंग एक्ट का प्रथम दोष यह था कि गवर्नर जनरल को अपनी परिषद् में बहुमत द्वारा लिए गए निर्णयों को रद्द करने का अधिकार नहीं था अर्थात् उस निर्णय को मानने के लिए वह बाध्य था। कौंसिल के चार सदस्यों में से तीन सदस्य हेस्टिंग्स के विरोधी थे, जो उसे शासन कार्य में सहयोग़ देने पर तुले हुए थे। बारवैल के अनुसार भारत में आने से पूर्व ही फ्रांसिस, क्लेवरिंग और मॉनसर गवर्नर जनरल के शासन के बार में अच्छी राय नहीं रखते थे और फ्रांसिस स्वयं गवर्नर जनरल बनने का महत्त्वाकांक्षी था। अतः इन तीनों व्यक्तियों ने भारत पहुँचने के पश्चात् शीघ्र ही हेस्टिंग्स के विरूद्ध एक गुट बना लिया और शासन कार्य में बाधा डालने लगे। बारवैल के अनुसार, तीनों कौंसिलों ने प्रारम्भ से ही पूर्व से निश्चित तथा पूर्व नियोजित ढंग से विरोध प्रारम्भ कर दिया।
यही कारण था कि हेस्टिंग्स जो कार्य करना चाहता था, वे नहीं हो सके और जो-जो कार्य वह नहीं करना चाहता था, उन्हें करने के लिए विवश होना पड़ा। उन तीन परिषद् सदस्यों का विरोध इनता धृष्टतापूर्ण तथा अनमनीय था कि, 1776 ई. में हेस्टिंग्स को विवश होकर त्याग-पत्र देने की बात गम्भीरतापूर्वक सोचनी पड़ी। वारेन हेस्टिंग्स के शब्दों में, मेरी स्थिति सचमुच कष्टदायी और अपमानजक है, मेरे पास एक्ट के कानून के अन्तर्गत कोई अधिकार नहीं, मेरी जगह पर काम करने वाले मेरे जैसे चरित्र वाले व्यक्ति को कोई आदर प्राप्त नहीं और मुझे उस उत्तरदायित्व के लिए, भी जिम्मेदारी लेनी पड़ती है, जिसको में स्वयं नहीं चाहता हूँ। लॉयल ने लिखा है, गवर्नर जनरल को एकदम प्रभावहीन बना दिया था। उसकी वैदेशिक नीति को कुसंगत बना दिया था तथा वारेन हेस्टिंग्स और पार्षदों के बीच संघर्ष पैदा कर दिया था। एक्ट के इस गम्भीर दोष के कारण गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल के विरोधी सदस्यों के बीच चार वर्ष तक संघर्ष चलता रहा, जो शासन कार्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। पी.ई. रॉबर्टस् के शब्दों में, सर्वोच्च कार्यालय में इस दीर्घकालीन तथा प्रबल संघर्ष के कारण ब्रिटिश सत्ता तथा कम्पनी के भारतीय प्रशासन को गहरी चोट लगी।

गवर्नर जनरल का बम्बई तथा मद्रास पर अपूर्ण नियंत्रण-
इस एक्ट द्वारा बम्बई तथा मद्रास की सरकारों पर गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया। इसका कारण यह था कि एक्ट की धारा IX के अनुसार कुछ विकट परिस्थितियों में बम्बई तथा मद्रास की सरकारों को गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् की आज्ञा लिए बिना ही भारतीय शासकों के साथ युद्ध अथवा सन्धि करने का अधिकार दिया गया था। बम्बई तथा मद्रास की सरकार ने इस अधिकार का दुरूपयोग किया और विकट परिस्थितियो का बहाना बनाकर बंगाल के गवर्नर जनरल को बिना सूचना दिए मराठों और हैदरअली के साथ युद्ध लड़े। इन युद्धों के परिणामस्वरूप जन तथा धन की हानि हुई और कम्पनी सरकार की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। अन्य मामलों में भी बम्बई तथा मद्रास की सरकारें कार्य करने के लिए स्वतंत्र थीं। इससे कालान्तर में कम्पनी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
गवर्नर जनरल तथा सुप्रीम कोर्ट का झगड़ा-
गवर्नर जनरल और सर्वोच्च न्यायालय में सर्वोच्च कौन था। इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई थी। इस क्षेत्रीय अस्पष्टता के कारण दोनों में अधिकार क्षेत्र के लिए प्रायः झगड़ा हो जाता था। एक ओर, गवर्नर जनरल ने मुगल सम्राट से शक्तियाँ प्राप्त की थीं, जिसको ब्रिटिश संसद ठीक तरह से निर्धारित नहीं कर सकी। दूसरी ओर, सपरिषद् गवर्नर जनरल द्वारा बनाई गई विधियों को सर्वोच्च न्यायालय को रद्द करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया। इस कारण गर्वनर जनरल और उसकी कौंसिल का सुप्रीप कोर्ट के साथ झगड़ चलता रहा। पुन्निया ने कहा एक्ट की धाराएँ अपनी कार्यशैली में अस्पष्ट और अरिभाषित थीं एवं नकारात्मक के स्थान पर सकारात्मक ढंग पर कार्यरत थीं, जिससे उसके बनाने वाले भी भ्रमित हो जाते थे और उनके अनेक अर्थ निकलते थे, जिसके फलस्वरू सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कौंसिल में गम्भीर झगड़े प्रारम्भ हो गए। कम्पनी के एक जमींदार कासिजोरा के राजा के केस में सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर जनरल में प्रत्यक्ष रूप से झगड़ा छिड़ गया। सुप्रीम कोर्ट के जज श्री हाड़ा ने कासिजोरा के राजा के विरूद्ध एक आदेश जारी किया, लेकिन गवर्नर जनरल ने राजा को यह सूचना दी कि यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं आता है। अतः वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानें। सुप्रीम कोर्ट ने जब राजा को गिरफ्तार करने के लिए अपने कर्मचारी भेजे, तो गवर्नर जनरल ने न्यायालय के इन अधिकारियों को पकड़कर लाने का आदेश दिया। इस तरह से गवर्नर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रत्यक्ष रूप से झगड़ा चलता रहा, जिसका कम्पनी के प्रशासन पर हानिकारक प्रभाव पड़ा।

सर्वोच्च न्यायालय का अस्पष्ट क्षेत्राधिकार-
इस एक्ट का महत्त्वपूर्ण दोष यह था कि इसमें सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं की गई थी। कुछ और मौलिक बातें भी अस्पष्ट तथा अनिश्चित थी। उदाहरणस्वरूप, ब्रिटिश प्रजा की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी गई थी, यह स्पष्ट नहीं था कि इस श्बद से अभिप्राय केवल अंग्रेजों से है अथवा कलकत्ता निवासियों से है अथवा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में रहने वाले समस्त भारतीयों से है। सुप्रीम कोर्ट का दावा था कि उसको देश के सारे निवासियों के नाम आदेश जारी करने तथा उनके मुकदमें सुनने का अधिकार है, जबकि गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल सुप्रीम कोर्ट के इस अधिकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए निश्चिय की यह एक भारी समस्या थी।
विधि की अस्पष्टता-
इस एक्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि कौन-से कानून (हिन्दू कानून या मुस्लिम कानून या अंग्रेजी कानून) के आधार पर न्याय किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के जज केवल अंग्रेज कानून जानते थे। हिन्दूओं तथा मुसलमानों के कानूनों तथा रीति-रिवाजों से अनभिज्ञ थे। अत वे अंग्रेजी विधि से नागरिकों के मामलों की सुनवाई करते थे। इससे भारतीयों को बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इस प्रकार, उन्हें वांछित न्याय नहीं मिल पाता था। जी.एन. सिंहने लिखा है, इससे उनमें काफी विक्षोभ तथा शेष पैदा हुआ। इसका परिणाम बहुत गम्भीर होता अगर सपरिषद् गवर्नर जनरल ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तथा संसद ने 1781 ई. संशोधन द्वारा अधिनियम पास नहीं किया होता। इस एक्ट द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं की गई थी। अतः सुप्रीम कोर्ट तथा प्रान्तीय या प्रादेशिक न्यायालयों के बीच विवाद उत्पन्न हो गए।
कम्पनी के संविधान में दोषपूर्ण परिवर्तन-
इस एक्ट द्वारा एक हजार पौण्ड के हिस्सेदारों को ही संचालन मण्डल के सदस्यों के चुनाव में मतदान करने का अधिकार था। इससे 1246 हिस्सेदार, जिनके हिस्से एक हाजर पौण्ड से कम मूल्य के थे, मताधिकार से वंचित हो गए। बड़े हिस्सेदारों को एक से अधिक मत देने का अधिकार दिया गया, जिसके कारण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप, कम्पनी का संचालक मण्डल एक स्थायी अल्पतन्त्र में बदल गया। राबर्ट्स ने लिखा है, यह प्रावधान संचालक मण्डल के संविधान में परिवर्तन से सम्बन्धित अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहा। इसके अतिरिक्त जी.एन. सिंह ने लिखा है, स्वामी मण्डल में मताधिकार योग्यताएँ बदलने से तात्कालीन स्थिति में कोई अन्तर नहीं आया क्योंकि कम्पनी के सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कम्पनी में प्रभाव घटाने का महान उद्देश्य सिद्ध नहीं हुआ।
कम्पनी पर संसद का अपर्योप्त नियंत्रण-
इस एक्ट में यह व्यवस्था की गई थी कि भारत में कम्पनी की सरकार से संचालकों को जो भी पत्र व्यवहार होगा, 15 दिन के अन्दर उनकी कॉपियों (नकलें) मन्त्रियों के पास भेजी जाएँगी। कम्पनी अपने कार्यो की रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को भेजती थी, किन्तु सरकार ने उन रिपोर्टो की जाँच के लिए कोई व्यवस्था नहीं की। अतः कम्पनी पर संसद का नियंत्रण अपर्याप्त और प्रभावहीन री रहा।
कमजोर कार्यपालिका-
इस एक्ट के अन्तर्गत दुर्बल कार्यपालिका की रचना की गई थी। गवर्नर जनरल अपनी कौंसिल के सामने शक्तिहीन था। कौंसिल या कार्यकारिणी स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट के सामने शक्ति हीन थी। वस्तुतः इस एक्ट में यह व्यवस्था करके गवर्नर जनरल द्वारा बनाए गए, कानूनों या अध्यादेशों पर सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए, कार्यकालिका को दुर्बल कर दिया। इस एक्ट के दोषों के बारे में पुन्निया ने लिखा है, अधिनियम के उपबन्धों की भाषा इतनी अस्पष्ट तथा अनिश्चित थी और सकारात्मक शब्दों से भरी हुई थी कि इसके निर्माताओं का लक्ष्य दुर्बल हो गया तथा उपबन्धों की एक से अधिक व्याख्या दी जा सकती थी। संक्षेप में पी.ई. रॉबर्ट्स के मतानुसार, इस अधिनियम ने न तो राज्यों कोम्पनी के ऊपर सुनिश्चित नियंत्रण प्रदान किया और न कलकत्ता को अपने कर्मचारियों पर, न महाराज्यपाल (गवर्नर जनरल) को अपनी परिषद् पर और न कलकत्ता प्रेसीडेन्सी को मद्रास और बम्बी की ्‌रेसीडेन्सियों पर सुनिश्चित नियंत्रण प्रदान किया। 1918 के भारतीय संवैधानिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार की गई थी कि, इस एक्ट ऐसे गवर्नर जनरल की सृष्टि की, जो अपनी ही कौंसिल के समक्ष शक्तिहीन था और एक ऐसी कार्यपालिका बनाई, जो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शक्तिहीन थी और साथ ही स्वयं शान्ति के उत्तरदायित्त्वों और देश के हित का उत्तरदायित्व भी इस पर नहीं आया।
रेग्यूलेटिंग एक्ट के इन दोषों को दूर करने के लिए 1781 ई. में बंगाल न्यायालय एक्ट पास किया गया। इस एक्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को काफी सीमित कर दिया गया और गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल की शक्तियों में वृद्धि की गई। इसके बाद 1784 ई. में पिट्स इण्डिया एक्ट पास किया गया, जिसके अनुसार गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल के निर्णयों के विरूद्ध भी विशेष आवश्यकता पड़ने पर काम करने की आज्ञा दे दी गई। इसके पश्चात् 1786 ई. में एमेण्डिंग एक्ट पास किया गया, जिसके द्वारा गर्वनर जनरल को महत्त्वपूर्ण मामलों में कौंसिल के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार दिया गया।
रेग्यूलेटिंग एक्ट की अपूर्णताओं के कारणइस अधिनियम की अपूर्णताओं के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
(1) ब्रिटिश पार्लियामेन्ट को एक ऐसी समस्या सुलझानी पड़ी, जो एकदम बिलकुल नई थी। 1765 ई. तक कम्पनी मुगल सम्राट की दीवान बन चुकी थी। इस नाते पार्लियामेंट उसके भारतीय प्रदेशों पर अपनी प्रभुसत्ता घोषित करने से हिचकिचाती थी। यही कारण था कि पार्लियामेंट कम्पनी के मामलों में आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थी। ऐसी परिस्थितियों में एक्ट की धाराओं का अस्पष्ट तथा दोषपूर्ण होना कोई बड़ी बात नहीं थी।
(2) ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्यों को भारतीय मामलों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान नहीं था। ब्रिटिश सरकार को भी उस समय भारत की स्थिति और उसी समस्या के हल का ठीक तरह पता न था। उसके पास कुछ ऐसे विश्वसनीय व्यक्ति भी न थे, जो उसे इस विषय पर आवश्यक परामर्श दे सकते। कम्पनी के कर्मचारी सरकार को ठीक सलाह दे सकते थे, परन्तु वे रिश्वतखोरी के कारण इतने बदनाम थे कि ब्रिटिश राजनीतिज्ञ उनसे धृणा करते थे और उनसे परामर्श लेने के पक्ष में नहीं थे। अतः दक्ष-मंत्रणा के अभाव में इस अधिनियम बनाने वालों के लिए गलती करना स्वाभाविक था।
(3) इल्बर्ट ने लिखा है, एक्ट में दोषों का होना स्वाभिवाक था। कुछ तो इसलिए की समस्या इस प्रकार की थी और कुछ इसिलिए की पार्लियामेंट के सम्मुख एक कठिन संवैधानिक प्रश्न था। जी.एन.सिंह ने लिखा है, इस एक्ट के दोष चाहे जितने गम्भीर हो, परन्तु वे घातक सिद्ध नहीं हुए।
(4) लार्ड नार्थ जिसने यह बिल पेश किया, दृढ़ विचारों का व्यक्ति नहीं था। उसे निर्णायक कार्य करने की आदत बहुत कम थी। वह शासकीय क्षेत्र में अधिक परिवर्तन करने के पक्ष में नहीं था। इसलिए भी रेग्यूलेटिंग एक एक स्पष्ट तथा सुनिश्चित पग प्रमाणित न हुआ।

रेग्यूलेटिंग एक्ट का महत्त्व –
यद्यपि रेग्यूलेटिंग एक्ट में बहुत दोष थे, तथापि जिन परिस्थितियों में उसाक निर्माण हुआ, सर्वथा सराहनीय था। बाउटन राउज के अनुसार, एक्ट का उद्देश्य तो अच्छा था, पर जो तरीका उसने अपनाया, वह अधुरा था। सप्रे ने ठीक ही लिखा है, यह अधिनियम संसद द्वारा कम्पनी के कार्यों में प्रथम हस्तक्षेप था, अतः उसकी नम्रतापूर्वक आलोचना की जानी चाहिए। यह प्रथम अवसर था जबकि एक्ट के द्वारा ब्रिटिश संसद ने कम्पनी की व्यवस्था को सुधारने के लिए उसके कार्यों में हस्तक्षेप किया था। यह भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। अतः इसका संवैधानिक महत्त्व बहुत अधिक है। निम्मलिखित कारणों से यह भारत के संवैधानिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण सीमा चिन्ह बन गया-
(1) इसने यह स्पष्ट कर दिया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी केवल व्यापारिक संस्था ही नहीं है, बल्कि वह एक राजनीतिक संगठन है और जिसे राजनीतिक अधिकार भी प्राप्त है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में कार्य कर रही थी। इस एक्ट द्वारा उसे मान्यता प्रदान कर दी गई।
(2) इस एक्ट द्रारा संचालकों के कार्यकाल में वृद्धि कर दी गई, जिसके कारण अब से अपनी नीतियों को ठीक ढंग से कार्यान्वित कर सकते थे। पुन्निया ने इस सम्बन्ध में लिखा है, इस एक्ट के द्वारा डायरेक्टरों के लिए प्रदान लम्बी अवधि और अंशकालिक नवीनीकरण ने उनमें सुरक्षा की भावना तथा नीति में निरन्तरता उत्पन्न की।
(3) इस एक्ट द्वारा कम्पनी तथा कम्पनी के कर्मचारियों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण स्थापित हो गया। कम्पनी के गवर्नर जनरल, कौंसिल को सदस्य तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्याधीशों की नियुक्ति ब्रिटेन के सम्राट के द्वारा की जाती थी। इससे अन्याय एवं अत्याचारों का अन्त हो गया। धीरे-धीरे यह नियंत्रण कठोर होता गया और 1858 ई. में कम्पनी के शास का ही अन्त कर दी गया। इस प्रकार, इस एक्ट के परिणाम बड़े दूरगामी व स्थायी सिद्ध हुए।
(4) इस एक्ट द्वारा पहली बार भारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों पर कम्पनी शासन का एक व्यवस्थित विधान तैयार किया गया, जिससे शासन की एक स्पष्ट रूपरेखा निश्चित हुई। सर्वाधिक महत्त्व की बात यह है कि भविष्य में बनाए जाने वाले सभी संवैधानिक नियमों के लिए अधिनियम ने ढाँचा तैयार कर दिया।
(5) यह प्रथम अवसर था, जबकि ब्रिटिश सरकार ने यूरोप के बाहर भू-क्षेत्र के शासन का उत्तरदायित्व ग्रहण किया। यह एक्ट वास्तव में कम्पनी के भारतीय क्षेत्र में बिना क्राउन के उत्तरदायित्व सम्भाले अच्छी सरकार लाने का एक अच्छा प्रयास था।
(6) इस एक्ट द्वारा कम्पनी के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार निजी व्यापार और उपहार लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यह बात कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी।
(7) इस एक्ट द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी का आरम्भ किया गया था, जिसका ब्रिटिश शासनकाल में उत्तरोत्तर विकास होता गया।
(8) इस एक्ट द्वारा भारतीय प्रशासनिक ढाँचे का केन्द्रीकरण की दिशा में प्रथम प्रयास किया गया। बम्बई व मद्रास के गवर्नरों को गवर्नर जनरल के अधीन कर ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया। इस प्रकार, भारत में कम्पनी की विभिन्न शाखाओं पर एक सर्वोच्च सत्ता स्थापित कर दी गई थी।
इस एक्ट के महत्त्व का वर्णन करते हुए प्रो. कीथ ने लिखा है, इस एक्ट लने कम्पनी के इंग्लैण्ड में स्थिति संस्थाओं के विधान में परिवर्तन किया। भारत सरकार के स्वरूप में कुछ सुधार किए। कम्पनी के समस्त विजित प्रदेशों पर एक शक्ति का नियंत्रण स्थापित किया गया। कम्पनी को किसी अंश तब ब्रिटिश मंत्रिमण्डल की देख-रेख में रखने का प्रयत्न किया गया।
एस.आर. शर्मा ने ठीक ही लिखा है, रेग्यूलेटिंग एक्ट ने भारत में कम्पनी के शासन को उन्नत करने के लिए बिना ताज के महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया और उसका उत्तदायित्त्व प्रत्यक्ष रूप से धारण किया। इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण धारा सुप्रीम कोर्ट की स्थापना (बंगाल में उच्चतम न्यायालय की स्थापना के लिए) थी। इसके द्वारा ताज को समय-समय पर समाचार ज्ञात होते रहते थे, जिसके कारण वह कम्पनी के शासन का निर्णय कर सकता था। इसके द्वारा व्यक्तिगत व्यापार तथा भेंट व उपहार स्वीकार करने पर प्रतिबन्ध लगाए गए। गवर्नर जनरल की कौंसिल को सम्मिलित अधिकार प्राप्त हुए, जो सन् 1781 ई. तक चलते रहे। इसके द्वारा कम्पनी के प्रशासित प्रदेशों में एक उच्च सत्ता की स्थापना हुई। प्रो. सूद ने लिखा है, हमारे देश के वैधानिक इतिहास में इस अधिनियम का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह ब्रिटिश संसद के द्वारा पास किए गए अनेक कानूनों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम कड़ी है, जिसने भारत सरकार के स्वरूप को समय-समय पर ढालने और बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
राजस्थान के भूतपूर्व गवर्नर श्री गुरूमुख निहालसिंह ने अपनी पुस्तक भारत का वैधानिक विकास तथा राष्ट्रीय आन्दोलन में लिखा है, सन् 1773 के एक्ट का वैधानिक महत्त्व बहुत बड़ा है। इसका कारण यह है कि उसने निश्चित रूप से कम्पनी की राजनीतिक कार्यवाहिनी को स्वीकार किया। दूसरा कारण यह है कि, उस समय तक जो कम्पनी के निजी प्रदेश समझे जाते थे, उनमें सरकारी ढाँचा किस प्रकार का हो, यह निश्चित करने के लिए पार्लियामेंट ने अपने अधिकार पर पहली बार जोर दिया। तीसरा कारण यह है कि, भारतीय सरकार का ढाँचा बदलने के लिए पार्लियामेंट ने जो बहुत-से एक्त बनाए, उनमें यह सबसे पहला था। सन् 1919 ई. के भारत सरकार के अधिनियम की प्रस्तावना में यह बात अन्तिम रूप और बड़ी दृढ़ता से स्पष्ट की गई कि भारतवासियों के लिए किसप्रकार का विधान उचित और आवश्यक है, उसे निश्चित करने और लागू करने का एकमात्र अधिकार पार्लियामेंट को है।
यह एक्ट ब्रिटिश भारत का प्रथम लिखित संविधान के रूप में था। इसके द्वारा कम्पनी के राजनीतिक लक्ष्य व अस्तित्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था। इतना ही नहीं, इस एक्ट के आधार पर आगे आने वाले कानूनों की रूपरेखा तैयार की गई। संक्षेप में, यह एक्ट कम्पनी के संवैधानिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके द्वारा ऐसी शासन व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ जो, ऐंग्लो-भारतीय प्रशासनिक ढाँचे की आधारशिला बनी।

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