पिट्स इण्डिया एक्ट के पास होने के कारण

आधुनिक भारत का इतिहास-पिट्स इण्डिया एक्ट के पास होने के कारण

पिट्स इण्डिया एक्ट के पास होने के कारण

पिट्स इण्डिया एक्ट के पारित होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
(1) रेग्युलेटिंग एक्ट की त्रुटियाँ- रेग्यूलेटिंग एक्ट में अनेक दोष रह गए थे। वारेन हेस्टिंग्स ने इस एक्ट के अनुसार कार्य किया और उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस एक्ट का सबसे बड़ा दोष यह था कि गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल में बहुमत द्वारा किए गए निर्णयों को रद्द करने का अधिकार नहीं था। इसके अतिरिक्त उसका बम्बई तथा मद्रास की सरकारों पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं था। इसलिए वहाँ की सरकारें अपनी इच्छा से देशी शक्तियों के साथ युद्ध लड़ती रही। सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार अनिश्चित था अतः उसके साथ गवर्नर जनरल का विवाद चलता रहता था। 1781 ई. के बंगाल न्यायालय एक्ट के द्वारा सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार तो निश्चित कर दिया गया था, परन्तु रेग्यूलेटिंग एक्ट के अन्य दोषों को दूर नहीं किया गया था। अतः उनको दूर करने हेतु एक नवीन एक्ट की आवश्यकता थी।

(2) कम्पनी के भारतीय प्रशासन में अव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार- 
यद्यपि रेग्यूलेटिंग एक्ट के द्वारा गवर्नर जनरल, उनकी परिषद् के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के जजों को निजी व्यापार करने, रिश्वत या भेंट की सख्त मनाही कर दी गई थी, तथापि वे अप्रत्यक्ष रूप से बहुत से अनुचित तरीकों से भारत में धन जमा कर लेते थे। गवर्नर जनरल ने बनारस के राजा चेतसिंह और अवध की बेगम से धन प्राप्त करने के लिए ऐसे अत्याचार किए, जो नैतिक दृष्टिकोण से बहुत निन्दनीय थे। वारेन हेस्टिंग्स के साथियों ने धन एकत्रित करने भी मात दे दी। बारवेल, फ्रांसिस तथा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर एलिंग इम्पे ने अनुचित तरीकों से काफी धन एकत्रित किया। इतना नहीं, कम्पनी के कर्मचारी तथा अधिकारी भी अनुचित तरीकों से भारत में धन जमा कर लेते थे और रिटायर होकर इंग्लैण्ड में विलासितापूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। वे चुनाव जीतकर ब्रिटिश पार्लियामेंट में पहुँच जाते थे। अतः ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी के भारतीय प्रशासन में अव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए इस दिशा में एक नया एक्ट पारित करना आवश्यक समझा।

(3) ब्रिटिश सरकार का कम्पनी पर अपर्याप्त नियंत्रण- 
1781 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने कम्पनी के भारतीय प्रशासन की जाँच-पड़ताल के लिए दो कमेटियाँ नियुक्त की थीं। इन कमेटीयों ने अपनी रिपोर्टों में फैली भारत में फैली हुई अव्यवस्था के लिए कम्पनी के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। इस पर ब्रिटिश संसद में मई, 1782 ई. में वारे हेस्टिंग्स तथा उसके एक अन्य सहयोगी हार्नवाई को भारत से वापस बुलाने के लिए एक प्रस्ताव पास किया गया। परन्तु कम्पनी के स्वामी मण्डल ने इसे अस्वीकार कर दिया और हाऊस ऑफ कॉमन्स की इच्छा के विरूद्ध वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाए रखा क्योंकि वह कम्पनी को अनुचित ढंग से धन इकट्ठा करके देता था। अतः ब्रिटिश सरकार ने अनुभव किया कि रेग्यूलेटिंग एक्ट के द्वारा संसद का कम्पनी पर प्रभावशाली नियंत्रण स्थापित नहीं हुआ है और इस त्रुटि को शीघ्रातीशीघ्र दूर करने की आवश्यकता है। अतः इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सरकार ने एक एक्ट पारित करना आवश्यक समझा।

(4) कम्पनी की गलत नीति- 
कम्पनी के कर्मचारियों ने भारत में मैसूर के शासक, मराठों और रोहिलों से बिना किसी विशेष कारण के युद्ध आरम्भ कर दिए थे। इस युद्धों में कम्पनी का अपार धन व्यय हुआ। इनको आरम्भ करने से पूर्व कम्पनी ने ब्रिटिश सरकार की अनुमति प्राप्त नहीं की थी। अतः ब्रिटिश सरकार इन युद्धों के सख्त विरूद्ध थी।

(5) अमरीकी बस्तियों का छीना जाना- 
अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में इंग्लैण्ड की पराजय हुई, जिससे उसकी सत्ता तथा प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा। इसके अतिरिक्त इंग्लैण्ड को अमेरिका की 13 बहुमूल्य बस्तियों से हाथ धोने पड़े, जिसके कारण अंग्रेजों के व्यापार को जबरदस्त धक्का लगा। इन अमेरिकन बस्तियों के हाथ से निकल जाने के परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार की दृष्टि में भारतीय प्रदेशों ता महत्व बहुत बढ़ गया और वे इन्हें इंग्लैण्ड नरेश के मुकुट का सबसे सुन्दर तथा बहुमूल्य हीरा समझने लगे। प्रधानमंत्री पिट ने बिल प्रस्तुत करते समय स्वयं इस तथ्य की पुष्टि करते हुए यह शब्द कहे, बस्तियों के छिन जाने से इंग्लैण्ड के लिए भारतीय प्रदेशों का महत्व बहुत बढ़ गया है। अब हमें अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए इनमें कुशल शासन प्रबन्ध की व्यवस्था करनी चाहिए। अतः ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी के शासन पर अपना प्रभावशाली नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक नये एक्ट की आवश्यकता अनुभव की।

(6) भारत की भलाई- 
प्रधानमंत्री पिट चाहता था कि भारत में अच्छा शासन स्थापित हो और वहाँ के लोग इंग्लैण्ड से होने वाली भलाइयों को महसूस करें। उसने 6 जुलाई, 1784 ई. को हाऊस ऑफ कॉमन्स में भाषण देते हुए यह शब्द कहे, हमें यह देखना है कि भारत से हमारा देश अधिक से अधिक लाभ उठाए और कम्पनी के प्रदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भी हमारे सम्बन्ध अत्यधिक लाभदायक हों। इस प्रकार पीट ने इस एक्ट को पारित होने में काफी योग दिया और उसका एक्ट की रूपरेखा पर भी काफी गहरा प्रभाव पड़ा।

(7) कम्पनी द्वारा ब्रिटिश सरकार से आर्थिक सहायता की माँग-जब कम्पनी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई, तो मार्च, 1783 ई. में इसने ब्रिटिश सरकार से आर्थिक सहायता माँगी। इससे पार्लियामेंट को उसके शासन में हस्तक्षेप करने का अवसर प्राप्त हो गया। मि. फॉक्स ने कम्पनी की तानाशाही के विरूद्ध आवाज उठाई, जबकि मि. बर्क ने उसके भ्रष्टाचार की बहुत निन्दा की। बर्क ने अपने भाषण को समाप्त करते हुए यह शब्द कहे, सहायता और सुधार एक साथ होंगे। ब्रिटेन की जनता ने भी बर्क के विचारों का समर्थन किया। अतः मि. डुण्डास ने अप्रैल, 1783 ई. में कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए एक बिल पेश किया।

(8) डुण्डास और फॉक्स के बिल- 
पिट से पहले रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए तथा ब्रिटिश सरकार का कम्पनी पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए डुण्डास ने अप्रैल, 1783 ई. में तथा फॉक्स ने नवम्बर, 1783 ई. में बिल रखे थे, परन्तु अनेक कारणों से वे पास नहीं हो सके थे. इन विधेयकों ने सरकार को कम्पनी के संविधान में सुधार करने के लिए अवश्य ही प्रेरित किया।

पिट्स का इण्डियन बिल- 
फॉक्स इण्डिया बिल के असफल होने के बाद विलियम पिट ने जनवरी, 1784 ई. में पार्लियामेंट में ईस्ट इण्डिया बिल पेश किया। अगस्त, 1784 ई. में यह बिल पार्लियामेंट द्वारा पास होने और सम्राट की स्वीकृति प्राप्त करने पर एक्ट बन गया। इसे पिट्स इण्डिया का नाम दिया गया।

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