ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 

आधुनिक भारत का इतिहास-भारत का संवैधानिक विकास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 

1498 ई. में वास्को-डी-गामा नामक पुर्तगाली नाविक ने यूरोप से भारत को जाने वाले सामुद्रिक मार्ग की खोज की। यह खोज एक युगान्तकारी घटना सिद्ध हुई। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार गामा की इस खोज ने भारत और यूरोप के पारस्परिक इतिहास के सम्बन्ध में एक नये अध्याय का सूत्रपात किया, इसके फलस्वरूप यूरोप के लोग भारतीय इतिहास के रंगमंच पर पहले व्यापारियों के रूप में और फिर बस्तियों के बनाने वालों के रूप में उतर आए। इस सम्बन्ध में डॉडवेल ने इस प्रकार लिखा है, सम्भवत: मध्ययुग की अन्य किसी भी घटना का सभ्य संसार पर इतना गहरा प्रभाव नहीं पड़ा, जितना कि भारत जाने के समुद्र मार्ग खुलने का।

वास्को-डी-ग्राम ने कालीकट के हिन्दू शासक जमोरिन से पुर्तगालियों के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त की। इसके बाद पुर्तगालियों का भारत में व्यापार आरम्भ हुआ। सोलहवीं शताब्दी में उन्होंने दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर कालीकट, कोचीन और कलानौर के स्थानों पर अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए और गोआ, दमन एवं दीव आदि स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर लीं। इतना ही नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए वहाँ सुदृढ़ नौसेना भी रखी।

पुर्तगालियों की बढ़ती हुई शक्ति तथा व्यापार से प्रभावित होकर अन्य यूरोपियन देशों ने भी भारत के साथ व्यापार करने के लिए अपनी व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित की। 1602 ई. में हालैण्ड के डच व्यापारियों ने भारत में व्यापार के लिए एक कम्पनी स्थापित की। अब भारतीय व्यापार के लिए पुर्तगालियों एवं डचों में संघर्ष आरम्भ हो गया, जिसमें डचों को सफलता प्राप्त हुई।

इस समय इंग्लैण्ड में व्यापारियों ने भी पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का निश्चय किया। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु 24 सितम्बर, 1599 ई. को लन्दन के कुछ प्रमुख व्यापारियों ने फाउण्डर्स हॉल में एक सभा की, जिसकी अध्यक्षता नगरपालिका के अध्यक्ष लार्ड मेयर ने की। गम्भीर सोच-विचार के बाद इन व्यापारियों ने व्यापार सम्बन्धी अधिकार प्राप्त करने के लिए महारानी एलिजाबेथ की सेवा में एक प्रार्थना पत्र भेजा। महारानी ने इस प्रार्थना पत्र पर 31 दिसम्बर, 1600 ई. को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस प्रकार, भारत के साथ व्यापार करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई, जिसका नाम गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स इन्टू द ईस्ट इण्डीज (पूर्वी इण्डीज में व्यापार करने वाले व्यापारियों की कम्पनी और प्रशासक) रखा गया।

कम्पनी का संविधान 

महारानी के अधिकार-पत्र में कम्पनी के संविधान तथा उसके विशेषाधिकारों का उल्लेख किया गया था। इसके अनुसार कम्पनी के कार्यों का संचालन करने के लिए इंग्लैण्ड में दो समितियाँ थीं-स्वामी मण्डल (Court of Proprietors) एवं संचालक (Court of Directors)

कम्पनी के समस्त हिस्सेदार स्वामी मण्डल के सदस्य होते थे। मण्डल को यह अधिकार था कि वह कम्पनी और उसके कर्मचारियों के लिए उपनियम बना सके और आदेश एवं अध्यादेश जारी कर सके। इसके अतिरिक्त वह नियमों की अवहेलना करने वालों पर जुर्माना करता था एवं उन्हें दण्ड भी देता था। यह धन उधार देता था और सदस्यों के बीच लाभ का वितरण करता था। कम्पनी के व्यापारिक केन्द्रों का प्रशासन तथा कर्मचारियों के नियन्त्रण का अन्तिम उत्तरदायित्व स्वामी मण्डल के हाथ में था। यह मण्डल संचालक मण्डल के निर्णयों में संशोधन, परिवर्तन रद्द भी कर सकता था।

संचालक मण्डल में चौबीस सदस्य होते थे। इसका चुनाव स्वामी मण्डल के सदस्यों द्वारा उन्हीं के बीच से होता था। जिस सदस्य का कम्पनी में दो हजार पौण्ड या इससे अधिक मूल्य का हिस्सा रहता था, वह संचालक मण्डल का सदस्य बनने के लिए चुनाव लड़ सकता था। जिस सदस्य का कम्पनी में पाँच सौ पौण्ड हिस्सा होता था, वह केवल निर्वाचन में वोट दे सकता था। वस्तुतः: इस कम्पनी के कार्यों का संचालन स्वामी मण्डल द्वारा निर्मित कानून, विधियों, नियमों और उप-नियमों द्वारा करता था।

कम्पनी के शासन प्रबन्ध पर नियंत्रण रखने के लिए एक परिषद् होती थी, जिसमें पाँच सदस्य होते थे। गवर्नर उसका प्रधान होता था। इस प्रकार, वह प्रेसीडेन्सी का सर्वोच्च अधिकारी था। गवर्नर और उसकी परिषद् द्वारा मुख्य कार्य शासन प्रबन्ध पर नियंत्रण रखना, भारतीय शासन से सम्बन्ध स्थापित करना एवं न्याय प्रबन्ध आदि की देखभाल करना था।

कम्पनी के कार्यों का संचालन करने के लिए इसके निजी कर्मचारी होते थे, जिसको वेतन दिया जाता था। उन्हें व्यापार करने का निजी अधिकार भी दिया गया था। यह व्यवस्था कम्पनी के लिए कम खर्चीली तथा आकर्षित करने वाली थी। कर्मचारियों ने अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए अपार धनराशि संग्रहित की थी। उन्होंने भारतीयों का बहुत अधिक आर्थिक शोषण किया। कम्पनी के सदस्यों के बारे में ब्रूस ने लिखा है, स्थापना के समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी को साहसी लोगों की मण्डली कहा गया था, जिसके सदस्य लूट के लिए निकलते थे और जो धन कमाने के लिए झूठ, बेईमानी तथा फरेब करने में जरा भी संकोच नहीं करते थे। कम्पनी के मालिकों ने शुरू में ही निश्चय कर लिया था कि कम्पनी की नौकरी में वे शरीफ व्यक्ति को नहीं रखेंगे। इस तरह एक ऐसा गुट कायम हुआ, जिसके सदस्य सच झूठ, ईमानदारी-बेईमानी और न्याय-अन्याय का ख्याल नहीं रखते थे।

कम्पनी की शक्ति में वृद्धि

1600 से 1765 ई. तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी मुख्यत: व्यापारिक संस्था थी। इसका अपना कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं था। परन्तु ब्रिटिश पार्लियामेन्ट और भारतीय सभाओं ने उदारतापूर्ण संरक्षण के कारण कम्पनी खूब फली-फूली और वह धीरे-धीरे एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति बन गई। इस काल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की शक्ति में असाधारण वृद्धि हुई। उसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

जेम्स प्रथम तथा चार्ल्स प्रथम के शासन काल में कम्पनी की उन्नति कम्पनी स्थापना के केवल तीन वर्ष बाद अर्थात् 16903 ई. में महारानी एलिजाबेथ की मृत्यु हो गई और जेम्स प्रथम इंग्लैण्ड का राजा बना। उसने 1609 ई. में महारानी द्वारा कम्पनी को दिए गये अधिकार-पत्र की अवधि में वृद्धि की और कम्पनी के जहाजों की लम्बी यात्राओं में उन पर अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अधिकारियों को कुछ अधिकार भी प्रदान किए।

जेम्स प्रथम का उत्तराधिकारी चार्ल्स प्रथम कम्पनी के हितों के प्रति उदासीन था। उसके शासनकाल में 1623 ई. डचों ने कुछ अंग्रेजों का सम्बोना में वध कर दिया। जिसके कारण ब्रिटेन में तीव्रगति से रोष फैल गया। परन्तु चार्ल्स प्रथम ने इस दिशा में कोई कदम तक नहीं उठाया। इसके विपरीत उसने अपने एक कृपापात्र सर विलियम कोर्टन को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए एक नई कम्पनी की स्थापना का अधिकार देकर जले पर नमक छिड़का। कोर्टन ने असाडा कम्पनी की स्थापना की, जिसके कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बहुत बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

क्रॉमवेल और कम्पनी

चार्ल्स प्रथम की मृत्यु के पश्चात आलिवर क्रॉमवेल इंग्लैण्ड की राजगद्दी पर बैठा। उसने कम्पनी के हितों की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास किया। उसने डचों से लड़ाई लडी, और बैटमिन्स्टर की 1654 की सन्धि के अनुसार कम्पनी को डचों से 85,000 पौंड की धनराशि क्षतिपूर्ति के रूप में दिलवाई। इस राशि में से क्रामवेल ने 50,000 पौण्ड अपने युद्धों का खर्च पूरा करने के लिए कम्पनी से उधार लिए। ए.सी.बनर्जी ने इस सम्बन्ध में लिखा है, कम्पनी को उसके विशेषाधिकारों के लिए मूल्य चुकाने के लिए विवश करने की नीति का श्रीगणेश किया।

क्रॉमवेल ने 1657 ई. में एक चार्टर द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा असाडा कम्पनी को मिलाकर एक बना दिया। हण्टर के शब्दों में, इस प्रकार लंदन की यह कम्पनी मध्ययुगीन श्रेणी (Guid) के एक निरर्थक अवशेष से बदल आधुनिक संयुक्त पूँजी कम्पनी का एक सशक्त अग्रदूत बन गई। इस प्रकार, क्रॉमवेल ने कम्पनी की सराहनीय सहायता की।

चार्ल्स द्वितीय का उदारतापूर्वक संरक्षण

1657 ई. में क्रॉमवेल की मृत्यु के पश्चात उनका पुत्र रिचर्ड क्रॉमवेल इंग्लैण्ड का स्वामी बना, परन्तु वह अयोग्य एवं दुर्बल शासक सिद्ध हुआ। इस पर इंग्लैण्ड की प्रजा ने चार्ल्स के पुत्र चार्ल्स द्वितीय को निर्वासन से वापिस बुलाकर 1660 ई. में देश का राजा बना दिया। चार्ल्स द्वितीय के उदारतापूर्ण संरक्षण के कारण कम्पनी ने असाधारण समृद्धि के काल में प्रवेश किया। उसने अपने शासनकाल में कम्पनी को पाँच अधिकार-पत्र (चार्ट्स) प्रदान किए। परिणामस्वरूप कम्पनी के हिस्सों का मूल्य बहुत बढ़ गया और उसे सिक्के बनाने, किले बनाने और उसमें सेना रखने, गैर-ईसाई शक्तियों के साथ युद्ध छेड़ने और सन्धि करने के सभी अधिकार मिल गए। 1688 में चार्ल्स द्वितीय ने बम्बई का नगर, जो उसे पुर्तगाल की राजकुमारी कैथराइन ऑफ ब्रैगैंजा के साथ विवाह में दहेज में मिला था, 10 पौण्ड वार्षिक किराये पर कम्पनी को दे दिया। कम्पनी को इस बन्दरगाह और नगर के तथा इसके निवासियों के लिए कानून, आदेश तथा अध्यादेश और संविधान बनाने का अधिकार दिया गया। इस प्रकार कम्पनी एक व्यापारिक संस्था से भू-स्वामिनी शक्ति बन गई। इसके अतिरिक्त कम्पनी पदाधिकारियों को अपने कर्मचारियों को दण्ड देने के अधिकार भी दिए गये।

जेम्स द्वितीय और कम्पनी

1685 ई. में जेम्स द्वितीय इंग्लैण्ड की राजगद्दी पर बैठा। उसके शासनकाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बहुत उन्नति की। सन् 1686 के चार्टर द्वारा उसने कम्पनी का नौसेना बनाने का और युद्ध काल में उन पर सैनिक कानून लागू करने का, अपने किलों में मुद्राएँ ढालने का और अधिकरण न्यायालय स्थापित करने का अधिकार दिया गया। 1687 में ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी को मद्रास में नगरपालिका तथा मेयर्स कार्ट (Mayors Court) स्थापित करने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार, इस काल में कम्पनी को सैनिक और न्यायायिक शक्तियाँ प्राप्त हो गईं। इससे कम्पनी के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा।

इसके अतिरिक्त कम्पनी के प्रसिद्ध संचालक सर जोसिया चाईल्ड ने भी इसके हितों की हर प्रकार से रक्षा करने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया। एस.सी. इल्बर्ट लिखते हैं, सर जोसिया चाईल्ड ने कम्पनी को एक ह्विग (Whig) समुदाय से टोरी (Tory) समुदाय में परिवर्तित कर दिया और इंग्लैण्ड के शासक जेम्स द्वितीय को इसका हिस्सेदार बना दिया। इसके अतिरिक्त, उसने खुले दिल से रिश्वतें देकर कम्पनी के हितों को विरोधी तत्वों के प्रभाव से सुरक्षित रखा।

1688 की शानदार क्रांति और कम्पनी को हानि

1688 की शानदार क्रांति ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर एक भीषण आघात किया। जेम्स द्वितीय के इंग्लैण्ड से भाग जाने के पश्चात ह्विग दल (Whig Pary) के नेता बहुत शक्तिशाली हो गए जो कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार के कट्टर विरोधी थे। सर जोसिया चाइल्ड का प्रभाव भी पहले की अपेक्षा कम हो गया था। इन परिस्थितियों से उत्साहित होकर बहुत से व्यापारियों ने, जिन्हें कम्पनी की समृद्धि से ईर्ष्या थी, इसके एकाधिकारों को भंग करना शुरू कर दिया। उन्होंने एक नई व्यापारिक कम्पनी बनाई, जो न्यू कम्पनी के नाम से प्रसिद्ध है। इस नई कम्पनी ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरूद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया।

सन् 1691 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक विचित्र संकट का सामना करना पड़ा। इस वर्ष पार्लियामेन्ट ने यह निश्चय किया कि पुरानी और नई दोनों ही कम्पनियों को मिलाकर एक कर दिया जाए। परन्तु सर जोसिया चाईल्ड की हठधर्मी के कारण यह प्रयत्न विफल रहा। इस पर पार्लियामेन्ट ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को तीन वर्ष के भीतर अपना व्यापार समेट लेने का नोटिस दिया और नई कम्पनी के पक्ष में एक चार्टर जारी करने का निश्चय किया। इस विचित्र स्थिति में सर जोसिया चाईल्ड ने बड़ी चतुराई से काम लिया और राजा के मन्त्रियों को उपहार या रिश्वत आदि देकर अपने पक्ष में कर लिया। परिणामस्वरूप सम्राट ने 1693 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पक्ष में एक अधिकार-पत्र जारी कर दिया। जिसमें कुछ विशेष शर्तों पर कम्पनी के विशेषाधिकारों की पुष्टि की गई थी। इसके बाद कम्पनी को 1698 में एक अधिकार-पत्र (चार्टर) और मिला, जिससे उसकी स्थिति और दृढ़ हो गई।

पुरानी तथा नई कम्पनी का विलय 

यद्यपि न्यू कम्पनी अभी तक अपने प्रयासों में सफल नहीं हुई थी, तथापि उसके संचालक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध करते रहे और उसे प्रत्येक क्षेत्र में हानि पहुँचाने की कोशिश भी की। उनकी आपसी शत्रुता का ब्रिटिश सरकार ने लाभ उठाया और दोनों कम्पनियों से काफी धन ऋण के रूप में ले लिया। धीरे-धीरे इन दोनों कम्पनियों के बीच विनाशकारी प्रतियोगिता शुरू हुई। इस पर इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए लार्ड गोल्डपिन की हस्तक्षेप करना पड़ा। अन्ततः: 1708 में दोनों कम्पनियों को मिलाकर एक बना दिया गया। इस प्रकार, एक नई कम्पनी बन गई, जिसका नाम 6 पूर्वी इण्डीज के साथ व्यापार करने वाले इंग्लैण्ड के व्यापारियों की संयुक्त कम्पनी (The United Company of Merchants of England to East Indies) रखा गया।

1711 और 1758 के बीच अधिनियम और चार्टर्स 

इसके बाद के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने 1709, 1711, 1730 एवं 1744 में विभिन्न एक्ट्स पास किए, जिनके फलस्वरूप कम्पनी के विशेषाधिकारों की अवधि 1780 तक हुई। 1709, 1728, 1754, 1756 एवं 1758 में पास होने वाले चार्टरों से भी उनकी शक्तियों में वृद्धि हुई। इस प्रकार, कम्पनी को उसके व्यापार काल (1600-1758) में इंग्लैण्ड की सरकार की ओर से बहुत अधिक सहायता प्राप्त हुई, जिसके कारण वह एक समृद्धशाली संस्था बन गई।

भारतीय राजाओं का संरक्षण

भारत में मुगल सम्राटों तथा देशी शासकों ने भी कम्पनी को व्यापार काल में उदारतापूर्ण संरक्षण दिया और इसे समय-समय पर बहुमुल्य रियायतें दी। 1608 ई. में इस कम्पनी का पहला जहाज हाकिन्स के नेतृत्व में सूरत बन्दरगाह पर पहुँचा। वह अपने ब्रिटेन के राजा का पत्र भी लाया था। वह मुगल सम्राट जहाँगीर के समक्ष अत्यन्त नम्रतापूर्वक उपस्थित हुआ। इस स्थिति का वर्णन करते हुए सुन्दरलाल ने ठीक ही लिखा है, जहाँगीर के दरबार में उस समय किसी को इस बात का गुमान नहीं हो सकता था कि दूर पश्चिम की एक छोटी-सी निर्बल अर्द्ध-सभ्य जाति का जो दूत उस समय दरबार में दो जानू होकर जमीन को चूम रहा था, उसी के वंशज, एक रोज मुगल साम्राज्य को अंग-भंग हो जाने पर हिन्दुस्तान के ऊपर शासन करने लगेंगे।

हाकिन्स ने ब्रिटिश राजा का एक पत्र मुगल सम्राट जहाँगीर को दिया। 6 फरवरी, 1613 ई. को एक शाही फरमान द्वारा अंग्रेजों को सूरत में एक व्यापारिक कोठी स्थापित करने की आज्ञा दी एवं मुगल दरबार में एक प्रतिनिधि रखने की अनुमति दे दी गई। कम्पनी की ओर से सर टॉमस को इस पद पर नियुक्त किया गया। टॉमस रो के प्रयासों से सूरत की कोठी की अत्यधिक उन्नति हुई। इस समय अंग्रेजों ने भडौच, अहमदाबाद और आगरा में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर दीं।

पी.ई. रॉबर्टस् ने टामस रो के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है, वह अपनी आशा के अनुसार, विधिवत और निश्चित सन्धि प्राप्त करने में असफल रहा। परन्तु उसे मुगल साम्राज्य के नगरों में कारखाने स्थापित करने की आज्ञा मिल गई। इतना ही नहीं, उसने तो अपनी राजनीतिक प्रतिभा और बुद्धि कौशल से मुगलों के हृदय में, एक राष्ट्र के रूप में, अंग्रेजों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर दी। उसका सबसे बड़ा काम तो यह था कि उसने कम्पनी के लिए एक ऐसी नीति निर्धारित की, जो आक्रमण भावना से रहित और बिल्कुल व्यावसायिक थी। कम्पनी ने सत्तर वर्ष तक इस नीति का पालन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थिति उत्तरोत्तर दृढ़ होती गई।

मद्रास पर अधिकार

1639 में चन्द्रगिरी के हिन्दू राजा ने मसुलीपट्टम के दक्षिण में लगभग 230 मील की भूमि कम्पनी को प्रदान की, जहाँ कि आजकल मद्रास नगर स्थित है। उसने कम्पनी को इस स्थान की किलेबन्दी करने, मुद्रा ढालने, न्याय करने और कुछ विशेष शर्तों के अनुसार शासन करने का अधिकार भी दिया। तीन वर्ष पश्चात कम्पनी को मद्रास में शासन सम्बन्धी कई अन्य अधिकार भी प्रदान किए गये, जिससे उसका नियंत्रण और अधिक दृढ हो गया। परन्तु इस कम्पनी पर मुगल सरकार का आधिपत्य था और इसके चिह्न स्वरूप कर्नाटक के मुगल सूबेदार को वार्षिक कर देती थी। कम्पनी के मद्रास में ढाले जाने वाले सिक्कों पर भी मुगल सम्राट का पूर्ण नियंत्रण था। सन् 1752 ई. में जब कर्नाटक के सूबेदार ने कम्पनी से वार्षिक कर लेना बन्द कर दिया, तो कम्पनी पूर्णरूप से मद्रास की शासक बन गई।

कलकत्ता की नींव रखना

1690 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने हुगली नदी पर 26 मील नीचे की ओर सुन्तनवी नामक गाँव में एक बस्ती की नींव रखी, जिसने बाद में कलकत्ता नगर का रूप धारण कर लिया। छ: वर्ष बाद इस बस्ती की किलेबन्दी की गई और उसका नाम फोर्ट सेंट विलियम (इस जगह आज कलकत्ता बसा हुआ है) रखा। सन् 1968 ई. कम्पनी ने बंगाल के सूबेदार को वार्षिक कर देने का वचन देकर तीन गाँव (सुंतनती, कलकत्ता और गोविन्दपुर) की जमींदारी खरीद ली। कम्पनी ने इस गाँवों से लगान इकट्ठा करने तथा दीवानी मुकदमों का निर्णय करने का अधिकार भी प्राप्त हो गया। सर सर्मन ने इन गाँवों के सम्बन्ध में शाही फरमान प्राप्त करने का प्रयत्न किया, परन्तु स्थानीय सूबेदार के विरोध के कारण उसे सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। 1756 ई. बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने एक औपचारिक सन्धि द्वारा कम्पनी के विशेषाधिकारों की पुष्टि की और उसे मुद्रायें ढालने तथा कलकत्ता की किलेबन्दी करने की अनुमति दे दी। इसके बाद ऐसी राजनीतिक घटनाएँ घटी, जिनसे कम्पनी एक राजनीतिक शक्ति बन गई।

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