आंग्ला-मराठा संघर्ष

आधुनिक भारत का इतिहास-आंग्ला-मराठा संघर्ष

आंग्ला-मराठा संघर्ष

आंग्ला-मराठा संघर्ष दक्षिणी भारत में ब्रितानियों का सबसे बड़ा प्रतिरोध मराठों ने किया। नाना फड़नवीस ने 1772 ई. से लेकर 1800 ई. तक मराठों की एकता के सूत्र में बांधे रखा। उनके नेतृत्व में मराठों ने ब्रितानियों से भीषण संघर्ष किया। उन्होंने 1779 ई. में प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध में ब्रितानियों को करारी पराजय की। ब्रितानियों का मानना था कि नाना के रहते मराठों पर विजय संभव नहीं है। वस्तुतः नाना फड़नवीस अपने समय का भारत का नहीं, अपितु एशिया का महान् कूटनीतिज्ञ था।

13 मार्च, 1800 ई. को नाना फड़नवीस की मृत्यु के साथ ही मराठों की एकता भी नष्ट हो गई। गायकवाड़-बड़ौदा, भोंसले-नागपुर, होल्कर-इन्दौर एवं सिंधिया-ग्वालियर आदि मराठा सरदारों के आपसी झगड़ों से परेशान होकर पेशवा व बाजीराव द्वितीय अंग्रेजो के संरक्षण में चला गया। उसने दिसम्बर, 1802 ई. में बेसीन की संधि द्वारा सहायक संधि स्वीकार कर ली। इसके अनुसार पेशवा ने अपने राज्य में अपने व्यय पर 6,000 ब्रितानी सैनिकों की सेना रखना स्वीकार कर लिया। अपने राज्य में ब्रितानियों के अतिरिक्त अन्य किसी यूरोपियन को नौकरी न देना स्वीकार कर लिया तथा अपने वैदेशिक सम्बन्धों के संचालन पर ब्रिटिश नियंत्रण स्वीकार कर लिया। अब ब्रितानियों ने पेशवा को पुन: पूना की गद्दी पर बैठा दिया। इसने मराठा सरदार क्रुद्ध हो उठे, क्योंकि बेसीन सन्धि द्वारा पेशवा ने मराठों की स्वतंत्रता को बेच दिया था। अब दौलतराव सिन्धिया एवं रघुजी भौंसले ने मिलकर ब्रितानियों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

इस प्रकार द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध आरम्भ हुआ। लार्ड वेलेजली ने लार्ड लेक को उत्तरी भारत में तथा आर्थर वेलेजली को दक्षिणी भारत में मराठों के विरूद्ध मोर्चा सौंपा। आर्थर वेलेजली ने अहमदनगर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भोंसले एवं सिंधिया को असई, अरगाँव तथा उड़ीसा में परास्त किया। भोंसले ने अन्त में बाध्य होकर देवगाँव की संधि कर ली। उन्होंने सहायक सन्धि को स्वीकार कर लिया तथा कटक एवं बालासोर के प्रान्त ब्रितानियों को दे दिये। उधर उत्तरी भारत में लार्ड लेक ने सिंधिया को परास्त करके दिल्ली, अलीगढ़ एवं आगार पर अधिकार कर लिया। सिंधिया को विवश होकर सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि करनी पड़ी। इसके द्वारा अहमदनगर, भड़ौच, दिल्ली एवं आगरा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया। इन सन्धियों के फलस्वरूप ब्रितानियों का साम्राज्य बहुत अधिक विस्तृत हो गया। वे भारत की सर्वोच्च शक्ति बन गये। मराठों की शक्ति क्षीण होने लगी थी।

जसवन्त होलकर द्वारा द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध में भाग न लेने से उनकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची थी। उन्होंने जयपुर पर 1804 ई. में आक्रमण कर दिया। चूँकि जयपुर का शासक सहायक सन्धि को स्वीकार कर चुका था, अतः वेलेजली ने होल्कर के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। होल्कर ने कर्नल मानसन को करारी शिकस्त दी। लार्ड लेक ने डीग एवं फर्रूखाबाद आदि स्थानों पर होल्कर को परास्त किया, किन्तु ब्रितानी भरतपुर के दुर्ग पर अधिकार न कर सके। होल्कर ने पंजाब जाकर महाराज रणजीत सिंह से ब्रितानियों के विरूद्ध सहायता माँगी, किन्तु रणजीत सिंह ने उसे सहायता देने से इनकार कर दिया। वेलेजली की साम्राज्यवादी नीति से रुष्ट होकर डायरेक्टरों ने उसके स्थान पर जार्ज बालों को गवर्नर जनरल बनाया। उसने फरवरी, 1806 में होल्कर से संधी कर ली। इसके अनुसार होल्कर ने चम्बल नदी के उत्तर के प्रदेश ब्रितानियों को सौंप दिए। ब्रितानियों ने चम्बल नदी के दक्षिणी प्रदेश होल्कर को लौटा दिए।

मराठे अपनी आपसी फूस के कारण परास्त हुए थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय ब्रितानियों के बढ़ते प्रभुत्व से चिंतित थे एवं मराठा सरदारों में एकता स्थापित करना चाहता था। पूना में ब्रिटिश रेजिडेण्ट एलफिन्स्टिन पेशवा की गतिविधियों को संदिग्ध मानता था। इस समय गायकवाड़ ब्रिटिश संरक्षण में चला गया था। पेशवा तथा गायकवाड़ के बीच कुछ विवाद होने पर गायकवाड़ ने इसके निपटारे हेतु अपने मंत्री गंगाधर राव को पूना भेजा, जहाँ उनकी हत्या हो गई। इसके लिए ब्रितानी पेशवा को जिम्मेदार मानते थे। 13 जून, 1817 को एक सन्धि के द्वारा ब्रितानियों ने पेशवा की शक्ति को समाप्त कर दिया। अतः पेशवा ने ब्रितानियों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

मराठों ने पूना के समीप किर्की की रेजीडेन्सी को जलाकर नष्ट कर दिया। मराठों ने पुन: किर्की में ब्रिटिश सेना को परास्त किया। इसी समय पूना पर ब्रितानियों का अधिकार हो गया, अतः पेशवा सतारा भाग गए। ब्रितानियों ने गाँव एवं अश्ति नामक स्थानों पर मराठों को परास्त किया। इसी समय नागपुर के अप्पा साहब तथा होल्कर भी युद्ध में शामिल हो गए, किन्तु वे क्रमश सीतालब्दी एवं महिदपुर में परास्त हुए। अन्त में पेशवा ने 3 जून, 1818 ई. को आत्मसमर्पण कर दिया। चतुर्थ आंग्ल मराठा युद्ध में सिंधिया एवं गायकवाड़ तटस्थ रहे।

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