आंग्ल-मैसूर संघर्ष

आधुनिक भारत का इतिहास-आंग्ल-मैसूर संघर्ष

आंग्ल-मैसूर संघर्ष

आंग्ल-मैसूर संघर्ष हैदर अली एक महान सेनापति थे। वह अपनी योग्यता से एक साधारण सैनिक से सुल्तान की गद्दी तक पहुँच गए। उन्होंने प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध (1767-69) में ब्रितानियों को करारी शिकस्त दी। ब्रितानियों ने मराठों द्वारा उनके राज्य पर आक्रमण करने पर उसकी सहायता का वचन दिया, किन्तु 1771 ई. में मराठों के मैसूर आक्रमण के समय ब्रितानियों ने अपने वचन का पालन नहीं किया। अतः हैदर अली ब्रितानियों से बहुत नाराज हुए। उन्होंने द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध में ब्रितानियों को परास्त कर अरकाट पर अधिकार कर लिया। 1782 ई. में हैदर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र टीपू सुल्तान गद्दी पर बैठे। उन्होंने ब्रितानियों से संघर्ष जारी रखा। उन्होंने जनरल मैथ्यु को परास्त किया। 1783 ई. की वर्साय की संधी द्वारा फ्राँसीसियों ने टीपू का साथ छोड़ दिया। मार्च, 1784 ई. में मंगलौर की संधि द्वारा ब्रितानियों एवं टीपू सुल्तान के एक-दूसरे के विजित प्रदेश लौटा दिये। निजाम ने ब्रितानियों से साठ-गाँठ कर ली थी। टीपू दक्षिणी भारत में ब्रितानियों द्वारा बाहर निकालने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा थे। 1790 ई. में तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध प्रारम्भ हो गया। लार्ड कार्नवालिस ने निजाम एवं मराठों को अपनी तरफ मिलाकर मैसूर पर चारों ओर से आक्रमण किये। टीपू दो वर्ष तक ब्रितानियों को लोहे के चने चबवाते रहे। इसके पश्चात लार्ड कार्नवालिस ने स्वयं मोर्चा संभाला एवं बंगलौर पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् मार्च, 1791 ई. में कोयम्बटूर पर अधिकार कर लिया। साधनों के अभाव के कारण टीपू अधिक समय तक संघर्ष न कर सके। ब्रितानियों ने मैसूर के कई दुर्गों पर अधिकार कर लिया एवं फरवरी, 1792 ई. में श्री रंगपट्टम की बाहरी रक्षा दीवार को ध्वस्त कर दिया। विवश होकर टीपू ने मार्च, 1792 ई. में रंगपट्टम की संधि कर ली। टीपू को 3 करोड़ रूपये युद्ध का हर्जाना तथा अपने राज्य का कुछ भाग देना पड़ा, जिसे ब्रितानियों, मराठों तथा निजाम ने बाट लिया।

तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध से टीपू को बहुत क्षति हुई थी। उनके कई प्रदेशों पर ब्रितानियों, मराठों तथा निजाम का अधिकार था। टीपू एक पराक्रमी तथा उत्साही शासक थे। फ्रांसीसी क्रांति से उनमें राष्ट्रीयता की नयी भावना उत्पन्न हुई। उन्होंने अपनी सेना का गठन फ्रेंच आधार पर किया एवं अपनी सेना में कई फ्रांसीसी अधिकारी रखें। उन्होंने अपनी सेना को यूरोपियन ढंग से प्रशिक्षण दिया। लार्ड वेलेजली टीपू की फ्रांसीसियों से सांठ-गांठ को खतरे की दृष्टि से देखता था। उन्होंने 1799 ई. में टीपू के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। निजाम ने ब्रितानियों का साथ दिया। टीपू को किसी भी शासक से कोई सहायता नहीं मिली। लार्ड वेलेजली ने अपने छोटे भाई सर आर्थर वेलेजली को युद्ध का मोर्चा सौंपा एवं स्वयं भी मद्रास आ गया। आर्थर वेलेजली एवं जनरल हैरिस ने मल्लावली नामक स्थान पर टीपू को पराजित किया। जनरल स्टुअर्ट ने 1799 ई. में सेदासरी के युद्ध में टीपू को शिकस्त दी। टीपू ने को ब्रितानियों से अपमानजनक संधि करने से इनकार कर दिया एवं श्री रंगपट्टम भाग गया, वहाँ वह युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुआ। अपनी देशभक्ति तथा स्वतंत्रता के लिए अपने संघर्ष के कारण टीपू का नाम भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

अब मैसूर के हैदरअली से पूर्व के हिन्दू राजा के वंशज को गद्दी पर बैठाया गया तथा उनसे सहायक संधि की गई। अब मैसूर राज्य की शक्ति का पूर्णतया अन्त हो चुका था एवं दक्षिण भारत में मराठे ही ब्रितानियों के एक मात्र शत्रु रह गए थे।

 मैसूर के पतन के प्रभाव : कार्ल मार्कस का विश्लेषण 
 कार्ल मार्क्स ने मैसूर के पतन के प्रभावों का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि इससे मराठों को छोड़कर समूचा दक्षिणी भारत ब्रितानियों के अधिपत्य में आ गया। मैसूर के 30 वर्ष लम्बे संघर्ष का अन्त हो गया। हैदरअली पहला शासक था, जिसने ब्रितानियों को देशी राजाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा माना। उसने ब्रितानियों के साथ मित्रता या कोई भी समझौता करने से इन्कार कर दिया। कालर्म मार्कस ने आगे लिखा है-हैदरअली तथा टीपू सुलतान ने कुरान पर हाथ रखकर ब्रिटिश शासकों के विरूद्ध स्थायी घृणा की शपथ ली। यद्यपि मैसूर ने लम्बे समय तक ब्रितानियों से संघर्ष किया, किन्तु अपने सीमित साधनों के कारण अन्त में उसने परास्त होना पड़ा। मैसूर के साथ संघर्ष के फलस्वरूप ब्रितानी एक विशाल स्थायी सेना रखने पर विवश हुए। मैसूर के पतन से ब्रितानियों की शक्ति में काफी वृद्धि हुई और अब उन्होंने मराठों से मुकाबला करने का निश्चय किया।

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