1857 की क्रान्ति-1857 की क्रांति के तत्कालीन कारण 

1857 की क्रान्ति-1857 की क्रांति के तत्कालीन कारण

1857 की क्रांति के तत्कालीन कारण 

1857 ई. तक भारत में विद्रोह का वातावरण पूरी तरह तैयार हो चूका था और अब बारूद के ढेर में आग लगाने वाली केवल एक चिंगारी की आवश्यकता थी। यह चिंगारी चर्बी वाले कारतूसों ने प्रदान की। इस समय ब्रिटेन में एनफील्ड राइफ़ल का आविष्कार हुआ। इन राइफ़लों के कारतूसों को गाय एवं सुअर की चर्बी द्वारा चिकना बनाया जाता था। सैनिकों को मुँह से इसकी टोपी को काटना पड़ता था, उसके बाद ही ये कारतूस राइफ़ल में डाले जाते थे। सर जॉन के ने स्वीकार किया है, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस मसाले को बनाने में गाय और सुअर की चर्बी का उपयोग किया गया था। स्मिथ का कहना है कि- सत्य का पता चलने पर कारतूसों को वापस लेने से यह शक और भी बढ़ गया। इसे कमजोरी का चिन्ह समझा गया जो अपवित्र इरादों की पोल खुल जाने पर किया गया था। विख्यात इतिहासकार लैकी ने भी स्वीकार किया है, “भारतीय सिपाहियों ने जिन बातों के कारण विद्रोह किया, उनसे अधिक जबरदस्त बातें कभी विद्रोह को जायज करार देने के लिए हो ही नहीं सकती।” इस प्रकार प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम लैकी का कहना है कि- “यह एक लज्जाजनक और भयंकर सत्य है कि जिस बात का सिपाहियों को विश्वास था वह बिल्कुल सच थी।” डॉ. ईश्वरीप्रसाद का कहना कि “बढ़ते हुए असन्तोष के इस वातावरण में चर्बी लगे कारतूसों ने बारूदखाने में चिनगारी का काम किया। कई ब्रितानी इतिहासकार कारतूसों के मामले को सन् 57 की क्रान्ति का एकमात्र मुख्य कारण मानते हैं। लेकिन कुछ इस इतना महत्व नहीं देते।”

लार्ड रॉबर्ट्सन, जो क्रान्ति के समय मौजूद थे, ने लिखा है, “फोरेस्ट ने भारत सरकार के कागजों की हाल में जाँच की है, उस जांच से सिद्ध होता है कि कारतूसों के तैयार करने में जिस चिकने मसाले का उपयोग किया गया था, वह वास्तव में दोनों पदार्थों अर्थात् गाय की चर्बी और सूअर की चर्बी को मिलाकर बनाया जाता था और इन कारतूसों के बनाने में सिपाहियों के धार्मिक भावों की ओर इतनी बेपरवाही दिखायी जाती थी कि जिसका विश्वास नहीं होता।”

इन चर्बी लगे कारतूसों ने विद्रोह को भड़का दिया। प्रो. ताराचन्द ने लिखा है, “इस प्रकार बारूद तैयार थी, सिर्फ़ चिनगारी की देरी थी। ” डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है, कोई भी समझदार व्यक्ति यह देख सकता था कि सुरंग तैयार थी और गाड़ी भी तैयार थी तथा कोई भी भावना बहुत सरलता से उसमें चिनगारी लगा सकती थी। चर्बी लगे कारतूसों की कहानी ने वह चिनगारी सुलगा दी और उससे जो धमाका हुआ, उसने भारत में ब्रितानी राज्य की जड़ें हिला दीं।” जस्टिन मैकार्बी ने लिखा है, “सच तो यह है कि हिंदुस्तान के उतरी और उत्तर पश्चिमी प्रांतों के अधिकांश भाग में यह देशी जनता की ब्रितानी सत्ता के विरुद्ध बग़ावत (विद्रोह) थी।…चर्बी के कारतूसों का मामला केवल इस तरह की एक चिनगारी थी जो अकस्मात इस सारे विस्फोटक मसाल में आ पड़ी….वह युद्ध एक राष्ट्रीय और धार्मिक युद्ध था।” इतिहासकार मैडले ने लिखा है, “किन्तु वास्तव में जमीन के नीचे ही नीचे जो विस्फोटक मसाला अनेक कारणों से बहुत दिन में तैयार हो रहा था, उस पर चर्बी लगे कारतूसों ने दियासलाई का काम किया।”

डॉ. सुभाष कश्यप ने इस सम्बन्ध में लिखा है, “वस्तुतः: यदि कोई सबसे बड़ा कारण खोजा जाए, तो वह विदेशी शासन और भारतीयों की दासता की स्थिति ही था। विद्रोह के कारणों की खोज असल में ब्रितानी इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों के साम्राज्यवादी दृष्टिकोण की उपज है। किसी भी पराधीन देश के लिए स्वयं पराधीनता ही विद्रोह का पर्याप्त कारण होती है, किन्तु ब्रितानी शासन को यह समझते थे कि ईश्वर ने उन्हें भारतीयों को सभ्य बनाने और अश्वेत जातियों पर शासन करने के लिए विशेष रूप से भेजा है। उस समय ब्रितानी यह सोच भी नहीं सकते थे कि भारतीयों की स्वाधीनता का अधिकार है अथवा कभी उनके सामने भारत भूमि को भारतीयों के ही हाथों में छोड़कर जाने की नौबत आ सकती है, अतः 1857 के विद्रोह से उन्हें आश्चर्य होना स्वाभाविक था। उन्होंने विद्रोह का कठोरतापूर्वक दमन करने के साथ-साथ उसके कारण खोजने और उन्हें दूर करने का प्रयास भी किया, इस आशय से और इस विश्वास से कि फिर कभी ऐसी विकट परिस्थिति पैदा न हो, जिससे भारत में ब्रितानी सत्ता को किसी चुनौती का सामना करना पड़ा।”

1 जनवरी, 1857 भारत में इस राइफ़ल का प्रयोग आरंभ हुआ। इसके बाद जब दमदम शस्त्रागार में कार्यरत एक निम्न जाति के खलासी को एक ब्राह्मण सैनिक ने अपने लोटे से पानी नहीं पीने दिया, तो खलासी ने उस पर व्यंग्य करते हुए कहा कि तुम्हारा धर्म तो नए सुअर एवं गाय की चर्बी मिश्रित कारतूसों का प्रयोग करने से भ्रष्ट हो जाएगा। इससे सत्य प्रकट हो गया। अतः सैनिक उत्तेजित हो गए। 23 जनवरी, 1857 ई. को कलकत्ता के समीप बैरकपुर छावनी में सैनिकों द्वारा इन कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार करने पर उन्हें दंड दिया गया। 29 मार्च, 1857 ई. को एक ब्राह्मण सैनिक मंगल पाण्डे ने अपने कुछ साथियों की मदद से कुछ ब्रितानी सैनिकों को मार डाला। अतः मंगल पाण्डे तथा उनके साथियों को मृत्यु दंड दिया गया। 21 मई, 1857 ई. को अवध रेजिमेंट द्वारा इन कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार करने पर उसे भंग कर दिया गया।

इसके बाद यह आग मेरठ में फैली। 24 अप्रैल, 1857 ई. को मेरठ छावनी के घुड़सवार सैनिक दल के 85 सैनिकों ने इन कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। अतः उन्हें 5 वर्ष की कैद दे दी गई। 10 मई, 1857 ई. को मेरठ की तीसरी घुड़सवार सेना ने विद्रोह कर दिया एवं भारतीयों की पैदल सेना ने भी उनका साथ दिया। इन विद्रोही सैनिकों ने जेल में बन्द सैनिकों को छुड़ा लिया। इसके बाद विद्रोहियों ने दिल्ली की तरफ कूच किया। ब्रितानी इतिहासकारों का मत है कि मेरठ की स्त्रियों ने सिपाहियों में जोश भरकर उनका कल्याण नहीं किया था। मेरठ के सिपाही निश्चित तिथि 31 मई के पहले क्रान्ति न की होती तो परिणाम कुछ दूसरा ही होता।

इस सम्बन्ध में मालसेन ने लिखा है कि “यदि पूर्व निश्चय के अनुसार एक तारीख को ही सारे भारत में स्वाधीनता का संग्राम शुरू हुआ होता तो भारत में एक भी ब्रितानी जीवित न बचता और भारत में ब्रितानी राज्य का अन्त हो गया होता।”

मि. जे. सी. विलसन ने लिखा है कि “वास्तव में मेरठ की स्त्रियों ने वहाँ के सिपाहियों को समय से पहले भड़का कर ब्रितानी राज्य को भारत में नष्ट होने से बचा लिया।”

ब्रितानी लेखक यह मानते है कि “मेरठ का विद्रोह कम्पनी के लिए हितकर और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए घातक था।”

“मेरठ में ब्रितानी अफसरों को मौत के घाट उतारने अथवा खदेड़ने के बाद भारतीय सेनाओं तथा नागरिकों की भड़ी दिल्ली की ओर बढ़ी। दो ही दिन के अन्दर दिल्ली पर स्वाधीन-सैनिकों का कब्जा हो गया। मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को एक बार फिर सारे भारत का बादशाह घोषित किया गया।”

“शीघ्र ही दिल्ली विजय का समाचार देश भर में फैल गया। मई का अंत होते-होते अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी, रूहेलखण्ड, मेरठ और दिल्ली आदि लगभग संपूर्ण भारत में विद्रोह चारों और फैल गया और इन सब क्षेत्रों ने विदेशी शासन से अपनी स्वाधीनता का ऐलान कर दिया। ब्रितानियों ने देशवासियों में आपस में धर्म आदि के आधार पर मतभेद पैदा करके एक-दूसरे को लड़ाने के प्रयास किए। प्राय: ये प्रयत्न असफल रहे, किंतु ब्रितानी सिक्खों के तथा पंजाब, राजपूताना, पटियाला, ग्वालियर, ज़िंद, हैदराबाद आदि के अनेक नरेशों को अपनी ओर करने, उनकी सहायता से भारतीयों की एकता भंग करने ओर विद्रोह दबाने में सफल हो गए। दिल्ली का घेरा महीनों तक चला। अंत में दिल्ली में रसद की कमी, ब्रिटिश साम्राज्य की अतुल शक्ति तथा ब्रितानियों की घूसख़ोरी और कुशल गुप्तचर व्यवस्था के कारण भारतीय सेनाओं को हार माननी पड़ी। मई और सितम्बर, 1857 के बीच लगभग 4-6 महीने तक दिल्ली में ब्रितानी शासन का नाम न रहा, दिल्ली स्वाधीन रही, राजधानी पर भारतीयों का शासन रहा।

24 सितम्बर को सिक्ख सेना की सहायता से ब्रितानियों ने फिर दिल्ली में प्रवेश किया और बादशाह बहादुरशाह को गिरफ्तार कर लिया गया। बादशाह के दो लड़कों को नंगा करके गोली मार दी गई तथा उनके सिर काटकर बादशाह के पास भेंट के रूप में प्रस्तुत किए गए। दिल्ली में भीषण नरसंहार किया गया। ब्रितानी सैनिकों ने जनता पर अमानुषिक अत्याचार किए। उन्हें सरकारी तौर पर एक सप्ताह तक खुलेआम लूट-मार करने की पूरी छूट दे दी गई। कहते है कि इस लूट-मार और नरसंहार के सामने लोग तैमूर और नादिरशाह को भी भूल गए। सैकड़ों कैदियों और असंख्य नर-नारियों तथा बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया। उत्तरी भारत के गाँव के गाँव मशीनगनों से उड़ा दिए गए।”

“1857 के स्वाधीनता संघर्ष का मुख्य केंद्र उत्तरी भारत ही रहा। देहली, कानपुर, बाँदा, बरेली, झाँसी, लखनऊ आदि में क्रांतिकारियों ने स्वतंत्र सरकार की स्थापना की। आधुनिक हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार आदि में विद्रोह के प्रमुख कर्णधार थे- राजा तुलाराम, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा, मौलवी अहमदशाह, बेग़म हज़रत महल, रानी झाँसी, राजा कुंवरसिंह, अमर सिंह आदि। 20 वर्षीया झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई वीरता पूर्वक ब्रितानी फ़ौजों से लड़ते-लड़ते शहीद हो गई। तात्या टोपे को उनके साथी ने धोखा देकर पकड़वा दिया। नाना साहब, बेग़म हज़रत महल, अमर सिंह आदि काफ़ी दिनों तक जूझते रहे। अंत में नेपाल की ओर चले गए। इस प्रकार एक-एक करके प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सभी नेताओं का पतन हो गया

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