1857 की क्रान्ति-1857 की क्रांति के आर्थिक कारण 

By | June 16, 2018
1857 की क्रान्ति-1857 की क्रांति के आर्थिक कारण

1857 की क्रांति के आर्थिक कारण

1. व्यापार का विनाश : ब्रितानियों ने भारतीयों का जमकर आर्थिक शोषण किया था। ब्रितानियों ने भारत में लूट-मार करके धन प्राप्त किया तथा उसे इंग्लैंड भेज दिया। ब्रितानियों ने भारत से कच्चा माल इंग्लैण्ड भेजा तथा वहाँ से मशीनों द्वारा माल तैयार होकर भारत आने लगा। इसके फलस्वरूप भारत दिन-प्रतिदिन निर्धन होने लगा। इसके कारण भारतीयों के उद्योग धंधे नष्ट होने लगे। इस प्रकार ब्रितानियों ने भारतीयों के व्यापार पर अपना नियंत्रण स्थापित कर भारतीयों का आर्थिक शोषण किया। पंडित नेहरु ने लिखा है, एक ग्रामीण उद्योग के बाद दूसरा ग्रामीण उद्योग नष्ट होता गया और भारत ब्रिटेन का आर्थिक उपांग या पुछल्ल बन गया। छ श्री रजनी पाम दत्त ने लिखा है, 1814 से 1835 के बीच में ग्रेट ब्रिटेन से भारत में भेजा जाने वाला कपड़ा 10 लाख गज से बढ़कर 510 लाख गज़ हो गया। दूसरी और इस समय के बीच में भारत से इंग्लैंड भेजा जाने वाला कपड़ा 121/2 लाख टुकड़ों से घटकर 3 लाख टुकड़े रह गया। 1844 तक यह घटकर 63,000 टुकड़े ही रह गया।

श्री रजनी पाम दत्त आगे लिखते हैं, इंग्लैण्ड से भारत में आने वाले कपड़े तथा भारत से इंग्लैंड में भेजे जाने वाले कपडे के मूल्य में भी महान् अंतर था। 1812 ई. और 1832 ई. के बीच भारत से बाहर भेजे जाने वाली सूती कपड़े 13 लाख पौंड से घटकर एक लाख पौंड से कर रह गया अर्थात् 17 वर्षों के विदेशी व्यापार का बारहवाँ या तेरहवां भाग रह गया। इन्हीं वर्षों में इंग्लैंड से भारत में आयात किए जाने वाले कपड़े का मूल्य 26,000 पौंड से बढ़कर 4 लाख पौंड हो गया अर्थात् 16 गुना हो गया। 1850 ई. तक भारत की यह दुर्दशा हो गई कि जो देश शताब्दियों से संसार को सूती कपड़ा निर्यात करता रहा था, वह ब्रिटेन से बाहर भेजे जाने वाले कुल सूती कपड़े का चौथा भाग आयात कर रहा था।

2. किसानों का शोषण : ब्रितानियों ने कृषकों की दशा सुधार करने के नाम पर स्थाई बंदोबस्त, रैय्यतवाड़ी एवं महालवाड़ी प्रथा लागू की, किंतु इस सभी प्रथाओं में किसानों का शोषण किया गया तथा उनसे बहुत अधिक लगान वसूल किया गया। इससे किसानों की हालत बिगड़ती गई। समय पर कर न चुका पाने वाले किसानों की भूमि को नीलाम कर दिया जाता था। जॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है, ब्रितानियों द्वारा भूमि कर वसूल करने की जो नई व्यवस्थाएँ स्थापित की गई और उनमें भूमि कर वसूल करने के जो दर (Rate) निर्धारित किए गए, वे इतने अधिक ऊँचे थे कि उससे किसान इतने निर्धन हो गए कि उनके पास भोजन तथा कपड़े की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी धन न रहा।

3. अकाल : अंग्रेजों के शासन काल में बार-बार अकाल पड़े, जिसने किसानों की स्थिति और ख़राब हो गई। विलियम डिग्वी के अनुसार 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में सरकारी आँकड़ों के अनुसार 15 लाख आदमी अकाल में मरे। दुर्भिक्षों से निपटने की सरकारी कोई नीति नहीं थी। सर जॉन स्ट्रेची ने तो दुर्भिक्षों पर रोकथाम की असमर्थता करते हुए कह दिया था कि भारत में अकाल बाढ़ ठीक उसी प्रकार आते हैं, जैसे कि पौधे पर फूल, हर मौसम में, हर साल और कभी-कभी तो सारे सारे साल। वारेन हेस्टिंग्ज जब गवर्नर जनरल बनकर भारत आया था, तब देश की दशा दयनीय हो रही थी। इतिहासकार डेविस अपनी पुस्तक वारेन हेस्टिंग्ज में कहते हैं कि च् जब हेस्टिंग्ज कलकत्ते पहुँचा, तब अकाल तोड़ कर रहा था। जीवित जनता लाशों को खा रही थी और गलियों के मुँह लाशों से रुँध गए थे।

श्री डब्ल्यू. ह्यस. लिल्ली ने अपनी पुस्तक “भारत तथा उसकी समस्याएँ” ( India and its problems) में भारत में अकाल से मरने वाले लोगों के निम्नलिखित आंकड़े सरकारी प्राक्कलनों के आधार पर दिए है।

वर्ष अकाल से होने वाली मृत्यु 

1800-1825 10 लाख 

1825-1850 4 लाख 

1850-1875 50 लाख 

1875-1900 11/2 करोड़ 

अतः डॉ. आर. सी. मजूमदार लिखते है, “जबकि ब्रितानियों द्वारा भारत के कपड़ा बनाने तथा अन्य उद्योगों का नाश किए जाने के कारण जनता को कृषि के अतिरिक्त और कोई सहारा नहीं रहा, तो उस समय भारी भूमि कर की वसूली ने लोगों की मुसीबत के प्याले को और भी अधिक भर दिया। भारी भूमि पर की वसूली के कारण किसानों के लिए दो समय पेट भरकर रोटी खाना भी सम्भव नहीं रहा और विपत्ति के दिनों के लिए वे शायद ही कुछ बचा सकते थे। इसलिए जब प्राकृतिक कारणों से फसलें खराब हो जाती थीं, जैसा कि प्रत्येक देश में होता है, तो उस समय भारतीय किसानों के पास बुरे दिनों का सामना करने के लिए कुछ भी नहीं बचता था और वे हजारों की संख्या में पिस्सू (तुच्छ प्राणी) की भाँति मर गए। मौतों की संख्या तथा भू राजस्व के निर्धारण में गहरा सम्बन्ध तत्कालीन सरकारी अधिकारियों ने स्वयं दर्शाया है, परन्तु ब्रिटिश सरकार अपने ब्रितानी अधिकारियों के परामर्श तथा भारतीयों के सर्वसम्मत विरोध के बावजूद अत्याचारी भू राजस्व पद्धति से चिपकी रही।”

4. इनाम की जागीरें छीनना : बैन्टिक ने इनाम में दी गई जागीरें भी छीन ली, जिससे कुलीन वर्ग के गई लोग निर्धन हो गए और उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। बम्बई के विख्यात घ् इमाम आयोग ‘ ने 1852 में 20,000 जागीरें जब्त कर ली। अतः कुलीनों में असन्तोष बढ़ने लगा, जो विद्रोह से ही शान्त हो सकता था।

5. भारतीय उद्योगों का नाश तथा बेरोजगारी : ब्रितानियों द्वारा अपनाई गई आर्थिक शोषण की नीति के कारण भारत के घरेलू उद्योग नष्ट होने लगे तथा देश में व्यापक रूप से बेरोज़गारी फैली।

रजनी पाम दत्त ने लिखा है, “ब्रितानियों द्वारा भारतीय उद्योगों के सर्वथा नाश करने के परिणामों का अर्थव्यवस्था पर सहज में ही अनुमान लगाया जा सकता है। इंग्लैंड में पुराने हथकरघा उद्योगों का जो नाश हुआ, उसके स्थान पर मशीन उद्योग स्थापित हो गए, परंतु भारत में ही लाखों कारीगरों तथा शिल्पियों की तबाही, बरबादी के स्थान पर नए वैकल्पिक उद्योग स्थापित नहीं किए गए। पुराने घनी आबादी और कपड़ा वाले नगर जैसे ढ़ाका और मुर्शिदाबाद (जिसको क्लाइव ने 1757 ई. लंदन जैसा विस्तृत तथा घनी आबादी वाला बयान किया था), सूरत तथा अन्य इस प्रकार के नगर कुछ ही वर्षा में ब्रिटेन की शोषण करने की नीति के फलस्वरूप ऐसे पूर्ण रूप से उखड़ गए, जैसा कि कोई विनाशकारी युद्ध अथवा विदेशी विजय की लूट-पाट भी नहीं कर सकती थी। छ सर चार्ल्स ट्रिविलियन ने 1840 ई. में संसदीय जाँच समिति के सम्मुख कहा, ” ढ़ाका की आबादी 1,50,000 से घटकर 30,000 या 40,000 रह गई है और जंगल तथा मलेरिया शीघ्रता से नगर पर छाये जा रहे हैं। ढ़ाका, जो कि भारत का मेनचेस्टर (इंग्लैंड का प्रसिद्ध औद्योगिक नगर) था, एक अत्यंत समृद्ध नगर से गिरकर एक छोटा सा कस्बा रह गया है। वहाँ वास्तव में बड़ी भारी विपत्ति आई है।”

देशी रियासतों के ब्रिटिश साम्राज्य में विलीनीकरण से कई सैनिक बेकार हो गए। इस तरह कम्पनी की नीतियों से कृषक, खेतीहर, मजदूर, कारीगर, सैनिक आदी बेकार हो गए थे, जिनकी संख्या लाखों में थी। इन बेरोजगार लोगों में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध गहरा असन्तोष था, अतः इन्होंने विद्रोह का मार्ग अपनाया।

भारत को निर्धन देश बनाना

डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है, “ब्रितानी राज के पहले 50 वर्षों के भारत के व्यापार तथा उद्योग-धन्धों का विनाश देखा, जिसके फलस्वरूप अधिकतर लोगों को खेती पर निर्भर होना पड़ा। अगले पचास वर्षों में कृषक, जो कि भारत की आबादी का 4/5 भाग था, तबाही-बर्बादी के किनारे पर पहुँच गया। 90 प्रतिशत किसानों को दिन में दो बार पेट भरने को रोटी भी नहीं मिलती थी, न ही उनके रहने के लिए अच्छा मकान तथा पहनने के लिए अच्छा कपड़ा था। इस तरह से भारत में उस पूर्ण तथा सर्वव्यापी निर्धनता की नींव रख दी गई, जो ब्रिटिश राज के पहले 100 वर्षों की मुख्य विशेषता थी।”

एक अन्य स्थान पर डॉ. मजूमदार ने लिखा है, “इस विषय में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि भारी खर्चे के दो कारण थे। पहला कारण तो यह था कि प्रशासन केवल ऊँचे ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा संचालित था और उनको बहुत वेतन मिलता था। दूसरा कारण यह भी था ब्रिटेन ने भारत में युद्ध भारत के खर्चे पर ही लड़े। बर्मा तथा अफगानिस्तान के युद्धों में भारी ख़र्च हुआ। उसमें भारतीयों का कोई हित नहीं छिपा था। उसको ब्रितानियों ने केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लड़ा था, परन्तु उसका सारा खर्च भारत के राजस्व पर डाल दिया गया। अतः भारत में ऋण बढ़ने का कारण ब्रिटेन के साम्राज्यवादी युद्ध थे। दूसरे शब्दों में, भारत को ब्रितानियों द्वारा अपनी विजय के लिए भी खर्च सहन करना पड़ता था।”

भारत की आर्थिक दुर्दशा का वर्णन करते हुए जॉर्ज थॉमसन ने लिखा है, “भारत की दशा की और देखिए, लोगों की परिस्थिति की तरफ देखिए, जो कि अधिक से अधिक निर्धन बना दिए गए हैं। राजाओं के राजपाट छीन लिए गए हैं, सामन्त या बड़े-बड़े जमींदार अपमानित किए गए हैं, भूस्वामी समाप्त कर दिए गए हैं, कृषक बर्बाद कर दिए गए है, बड़े-बड़े नगर खेती वाले गाँव बन गए हैं और गाँव बर्बाद हो गए हैं, भिखारीपन, गुण्डों के जत्थों द्वारा लूट-खसोट और विद्रोह प्रत्येक दिशा में बढ़ रहे है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। वर्तमान काल (1843 ई.) में भारत की यही स्थिति हैं। कई स्थानों पर बहुत अच्छी उपजाऊ भूमि को छोड़ दिया गया है। उद्योगों के लिए प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। लोगों के लिए काफी अन्न उत्पन्न करने के बजाय भूमि लाखों मुर्गे गाड़ने की जगह बन गई है, जो कि भूख से तड़पते हुए मर जाते है। इसे सिद्ध करने के लिए गत वर्ष के दृश्यों पर ध्यान दीजिए। इस हेतु मेरे साथ बंगाल प्रेसीडेन्सी के उत्तरी पश्चिमी प्रान्तों में चलिए, जहाँ में आपको 5 लाख लोगों की खोपड़ियाँ दिखा दूंगा, जो कि केवल कुछ ही महीनों में भूख से अकाल के दिनों में मर गए। हाँ, उस देश में मर गए, जो संसार के अनाज का गोदाम कहलाता है।”

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