1857 की क्रांति के असफलता के कारण

1857 के विद्रोह की असफलता के कारण

1857 की क्रांति के असफलता के कारण
1857 की क्रांति के असफलता के कारण

1857 के विद्रोह की असफलता के कारण

आजादी के लिये 1857 की क्रांति में सभी वर्ग के लोगों ने अपना सहयोग दिया था परन्तु यह क्रांति विफ़ल रही। इतिहासकार इस क्रांति की विफ़लता के निम्न कारण बताते है।

निश्चित तिथि के पूर्व क्रांति का भड़कना :- लक्ष्मी बाई, नाना साहब, अजीमुल्ला खां, बहादुर शाह जफ़र, तांया टोपे आदि क्रांतिकारियों ने 31 मई को क्रांति आरम्भ करने के बारे में योजना बनाई। इन सबने इस दिन बंदियों को मुक्त कराने, ब्रिटिश पदाधिकारियो को जान से मारने, ब्रितानियों के हथियारों व सरकारी खजाने को लूटने जैसी कई योजनाएं बनाई। इस योजना की खबर ब्रितानियों को नहीं थी। लेकिन उसी समय 24 मार्च को मंगल पांडे ने आवेश में आकरचर्बी वालेकारतूसों का विरोध करके क्रांति की शुरूआत कर दी। यह क्रांति बंगाल के अलावा दिल्ली, मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस आदि जगह फ़ैल गई। अगर क्रांति निश्चित समय पर हुई होती तो वह जरू र सफ़ल हुई होती।

क्रांति का स्थानीय स्वरूप :- 1857 की क्रांति पूरे राष्ट्र तक नहीं फ़ैल पाई। देश के सिंध, नर्मदा का दक्षिण हिस्सा, आदि भागों में क्रांति की लहर बिल्कुल भी नहीं पहुँच पाई। कई देशी राजाओं ने क्रांतिकारियों का साथ दिया लेकिन कुछ देशी राजाओं व अन्य लोगों ने ब्रितानियों का साथ दिया।

क्रांतिकारियो में प्रभावी नेता की कमी  :- इस क्रांति की विफ़लता का एक कारण यह भी था कि इसमें कुशल सेनानायक का अभाव था। यद्यपि ये सब साहसी, व कष्ट सहिष्णु थे लेकिन ये सब सही तरीके से एकत्रित नहीं हो पाए। कई बार ये आपस में ही लड़ते रहते थे। कई लोग लक्ष्मी बाई जैसी बहादुर क्रांतिकारी को सिर्फ़ महिला होने के कारण क्रांति का नेतृत्व नहीं करने दे रहे थे। इसी तरह बख्त खां को भी सिर्फ़ साधारण परिवार से सम्बंधित होने के कारण बहादुर होते हुए भी क्रांति का नेतृत्व नहीं करने दिया गया। इस क्रांति की विफ़लता के पीछे सफ़ल नेता का अभाव व आपसी फ़ूट ही था। यदि सब आपस में मिलकर ब्रितानियों का विरोध करते तो निश्चित ही सफ़ल हो जाते।

निश्चित लक्ष्य का अभाव :- सभी क्रांतिकारियों के क्रांति के पीछे उद्धेश्य अलग-अलग थे। जैसे बेगम हजरत महल अवध को कंपनी सरकार में मिलाने के कारण ब्रितानियों की विद्रोही बनी। कुंवरसिंह ब्रिटिश सरकार के व्यवहार से खुश नहीं थे। नाना साहब पेंशन ना मिलने के कारण ब्रितानियों के खिलाफ़ हुए। सबका उद्धेश्य साझा या आम नहीं था लेकिन वे सभी ब्रितानियों को भारत से निकालना चाहते थे। अगर सभी देशी राजाओं ने उनका साथ दिया होता वएक सुनिश्चित उद्धेश्य होता तो ब्रितानियों को इंग्लैंड की ओर भागना ही पड़ता।

साधन का अभाव  :- क्रांतिकारियों के पास पुराने शस्त्र थे जबकि ब्रितानियों के पास आधुनिक शस्त्र थे। क्रांतिकारियों के पास संदेश भेजने का भी साधन नहीं था तथा उनके पास धन की भी कमी थी, इसलिये सेना में नये लोग भर्ती नहीं होते थे। अतः क्रांति विफ़ल रही।

कैनिंग की उदारता :- 1857 में ब्रितानियों द्वारा भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसमे भारतीय लोगों को कई सब्जबाग दिखलाये गये। डलहौजी के बाद कैनिंग को गवर्नर जनरल बनाया गया जो क्रांति को दबाना चाहता था। जिसमें वह कुछ सफ़ल भी रहा। क्रंाति के दमन के बाद सेनापति निकोलसन ने आदेश दिया की बचे हुए क्रांतिकारियों को फ़ांसी पर चढ़ा दिया जाए। कैनिंग द्वारा क्रांति का दमन करने के बाद क्रांति फ़िर नहीं भड़की।

जन साधारण का क्रांति के प्रति उदासीन होना  :- इस क्रांति में सैनिकों राजाओं व कुछ लोगों के अलावा व्यापक जनता ने हिस्सा नहीं लिया इसके अलावा कुछ किसानों व मजदूरों ने भी हिस्सा नहीं लिया। इसका एक कारण अशिक्षा भी था जिससे जनता क्रांति का उद्धेश्य नहीं समझ पाई। एक तरफ़ क्रांतिकारियों ने लूटपाट मचाई, जेल तोड़ने से सिपाहियों के साथ चोर डाकू भी बाहर निकल गये जिससे समाज में फ़िर से अशान्ति फ़ैल गई। लोगों ने इन सबका जिम्मेदार सरकार की बजाय क्रांतिकारियों को बताया जिससे क्रांति विफ़ल रही थी।

अन्य कारण 

यद्यपि कई क्रांतिकारियों ने साहस के साथ दुश्मन के छक्के छुड़ाये लेकिन कुछ दूसरे कारण भी थे जिनके कारण यह क्रांति विफ़ल रही ।

ब्रिटिश सेना का एक संगठन व एक केन्द्र होता था। एक सेना के हटने पर दूसरी सेना आ जाती थी। जबकि भारतीय सेना में यदि युद्ध में कोई सैनिक मारा जाता तो सैनिक अपनी हार मान लेते थे व कई बार युद्ध बंद कर देते थे। उनमें धैर्य की कमी थी लेकिन ब्रितानियों की सेना में यह नहीं होता था उनका युद्ध जारी रहता था। इस कारण क्रांति विफ़ल रही। फ़िर भी, इन सब के बावजूद 1857 की क्रांति का विवरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

मेरठ का विद्रोह-
पूर्व योजनानुसार 31 मार्च,1857 का दिन संपूर्ण भारत में एक साथ विद्रोह करने हेतु तय किया गया था, किन्तु दुर्भाग्य से 29 मार्च,1857 को मंगल पांडे ने विद्रोह का झंडा खङा कर दिया। यह समाचार तत्काल मेरठ पहुँचा और 10मई, 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। इस प्रकार अपरिपक्व अवस्थामें विद्रोह करने से असफलता तो निश्चित ही थी।

सिक्खों एवं गोरखों की गद्दारी- राजपूत, सिक्ख व गोरखे अपनी वीरता के लिए विश्वविख्यात थे। कुछ इने-गिने स्थानों को छाङकर राजपूतों ने विद्रोह के प्रति उदासीनता प्रदर्शित की।सिक्खों ने ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन करना ही उचित समझा। सिक्ख बंगाल से,जिसने पंजाब विलय के समय अंग्रेजों का साथ दिया था, समर्थन करने को तैयार नहीं थे। अतः वे अंग्रेजों के प्रति वफादार रहे। सिक्खों ने दिल्ली और लखनऊ जीतकर क्रांति की कमर ही तोङ दी।इसी प्रकार गोरखों ने अपने सेनापति जंग बहादुर की अधीनता में अवध पर आक्रमण कर अंग्रेजों की मदद की तथा भारतीयों से गद्दारी कर क्रांति को असफल बना दिया।

दक्षिण भारत की उदासीनता- नर्मदा का दक्षिण भाग पूर्णतः शांत रहा। यदि उत्तर भारत के साथ-2दक्षिण भारत भी विद्रोह में कूद पङता तो इतने विशाल क्षेत्र में फैले विद्रोह को दबाना असंभव हो जाता। विद्रोह के प्रमुख केन्द्र बिहार,अवध,रूहेलखंड, चंबल तथा नर्मदा के मध्य की भूमि एवं दिल्ली ही थे। अतः अंग्रेजों ने दक्षिण से सेनाएँ बुला ली तथा विद्रोही क्षेत्रों पर आक्रमण करके विजय प्राप्त कर ली। अंग्रेजों को बहुत ही सीमित क्षेत्र में विद्रोह का सामना करना पङा। इस प्रकार दक्षिण भारत की उदासीनता अंग्रेजों के लिए वरदान सिद्ध हुई। इसलिए अंग्रेज,निजाम और सिधिंया का नाम कृतज्ञता से लेते रहे।

नरेशों का असहयोग- प्रायः सभी भारतीय नरेशों ने विद्रोह का दमन करने में अंग्रेजों का साथ दिया। सिंधिया के मंत्री दिनकरराव तथा निजाम के मंत्री सालारजंग ने अपने-2 राज्य में क्रांति को फैलने नहीं दिया। राजपूताना के नरेशों ने भी अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। विद्रोह काल में स्वयं केनिंग ने कहा था कि, यदि सिंधिया भी विद्रोह में शामिल हो जाय तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना पङ जाय।इसी प्रकार मैसूर का राजा, पंजाब में सिक्ख सरदार,मराठे और पूर्वी बंगाल आदि के शासक भी शांत रहे। यदि वे सभी मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध व्यूह-रचना करते तो अंग्रेजों को अपनी जान के लाले पङ जाते।

योग्य नेताओं का अभाव- विद्रोह को ठीक तरह से संचालित करने वाला कोई योग्य नेता नहीं था। यद्यपि विद्रोहियों ने बूढे बहादुरशाह को अपना नेता मान लिया था, लेकिन बूढे बहादुरशाह से सफल सैन्य – संचालन एवं नेतृत्व की आशा करना दुराशा मात्र थी।प्रमुख नेता नाना साहब चतुर अवश्य था, किन्तु वह सैन्य-संचालन में निपुण नहीं था। तांत्या टोपे का चरित्र उच्च था, किन्तु उसमें सैनिक योग्यता नहीं थी। सर्वाधिक योग्य नेताओं में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा जगदीशपुर का जमींदार कुंवरसिंह थे। रानी लक्ष्मीबाई वीर होते हुए भी अनुभवहीन थी। कुंवरसिंह भी वीर था, लेकिन पूर्णतया वृद्ध था तथा सभी उसे नेता मानने को तैयार न थे। इस प्रकार विद्रोह का कोई ऐसा योग्य नेता नहीं था, जो सबको संगठित कर संघर्ष को सफलता के द्वार तक पहुँचा सके।

नागरिकों का असहयोग-वस्तुतः मोटे तौर पर यह विद्रोह कुछ नरेशों, जागीरदारों एवं सैनिकों तक ही सीमित था। भारत की अधिकांश जनता कृषक थी। कोई भी विद्रोह इस वर्ग की उपेक्षा करके सफल नहीं हो सकता था। किन्तु विद्रोहियों ने किसानों का सहयोग प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। इस प्रकार यह क्रांति जन-क्रांति नहीं बन सकी। जो लोग संघर्ष कर रहे थे वे अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए लङ रहे थे।

केन्द्रीय संगठन का अभाव- विद्रोह आरंभ होने से पूर्व कुछ संगठन एवं योजना अवश्य थी, किन्तु विद्रोह आरंभ हो जाने के बाद योजना का क्रमबंद्ध रूप दिखाई नहीं देता। विद्रोही सेनाओं के दिल्ली पहुँचने तक तो किसी पूर्व निश्चित योजना का स्वरूप दिखाई देता है, किन्तु बाद में वह समाप्त – सा दिखाई देता है। कोई केन्द्रीय संगठन भी होना चाहिए था, जो अंग्रेजों की गतिविधियों को ध्यान में रखकर सभी क्षेत्रों के विद्रोहों में समन्वय स्थापित कर सके।

लार्ड केनिंग की उदारता- तात्कालिक गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग की उदारता भी विद्रोहियों को शांत करने में सफल हुई।पी.ई.रॉबर्ट्स ने लिखा है कि उसकी नम्रता न केवल नैतिक रूप से विस्यमकाली थी, वरन् राजनीतिक रूप से औचित्यपूर्ण थी।

ठोस लक्ष्य का अभाव- भारतीय सैनिकों ने चरबी वाले कारतूसों से तथा अपनी असुविधाओं के कारण विद्रोह किया था और वह भी पूर्व निश्चित समय से पहले। मुसलमान जहाँ मुगल सम्राट के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करना चाहते थे, वहाँ हिन्दू नाना साहब और रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में हिन्दू सर्वोच्चता की पुनः स्थापना चाहते थे।

अंग्रेजों की अनुकूल परिस्थितियाँ- यदि 1857 का विप्लव कुछ समय पूर्व हुआ होता तो अंग्रेजों को भारत से भागना पङता। किन्तु जिस समय विद्रोह आरंभ हुआ, तब तक परिस्थितियाँ अंग्रेजों के अनुकूल हो गयी थी। क्रीमिया का युद्ध समाप्त हो चुका था। भारत में देशी नरेश,सामंत तथा बुद्धिजीवी अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे। डलहौजी के सुधारों के परिणामस्वरूप सेना के पास रसद आदि भेजने हेतु संचार व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी।

सीमित साधन- विद्रोहियों के पास साधन अंग्रेजों की अपेक्षा अत्यंत ही सीमित थे। विद्रोहियों के पास त्याग और बलिदान की भावना वाले सैनिक थे, किन्तु उनका रणकौशल अंग्रेजों जैसा नहीं था। अंग्रेजों के पास यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित सैनिक थे, जो रणनीति एवं कूटनीति में दक्ष थे, जबकि विद्रोही केवल मरना जानते थे, लङना नहीं। उन्हें आर्थिक असुविधाओं का भी सामना करना पङा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here