रेग्यूलेटिंग एक्ट का महत्व

आधुनिक भारत का इतिहास-रेग्यूलेटिंग एक्ट का महत्व

रेग्यूलेटिंग एक्ट का महत्व

रेग्यूलेटिंग एक्ट का महत्व यद्यपि रेग्यूलेटिंग एक्ट में बहुत दोष थे, तथापि जिन परिस्थितियों में उसका निर्माण हुआ, सर्वथा सराहनीय था। बाउटन Rouse के अनुसार, एक्ट का उद्देश्य तो अच्छा था, पर जो तरीका उसने अपनाया, वह अधूरा था। सप्रे ने ठीक ही लिखा है, यह अधिनियम संसद द्वारा कम्पनी के कार्यों में प्रथम हस्तक्षेप था, अतः उसकी नम्रतापूर्वक आलोचना की जानी चाहिए। यह प्रथम अवसर था जबकि एक्ट के द्वारा ब्रिटिश संसद ने कम्पनी की व्यवस्था को सुधारने के लिए उसके कार्यों में हस्तक्षेप किया था। यह भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम था। अतः इसका संवैधानिक महत्व बहुत अधिक है। निम्नलिखित कारणों से यह भारत के संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण सीमा चिन्ह बन गया-

(1) इसने यह स्पष्ट कर दिया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी केवल व्यापारिक संस्था ही नहीं है, बल्कि वह एक राजनीतिक संगठन है और जिसे राजनीतिक अधिकार भी प्राप्त है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में कार्य कर रही थी। इस एक्ट द्वारा उसे मान्यता प्रदान कर दी गई।

(2) इस एक्ट द्वारा संचालकों के कार्यकाल में वृद्धि कर दी गई, जिसके कारण अब से अपनी नीतियों को ठीक ढंग से कार्यान्वित कर सकते थे। पुन्निया ने इस सम्बन्ध में लिखा है, इस एक्ट के द्वारा डायरेक्टरों के लिए प्रदान लम्बी अवधि और अंशकालिक नवीनीकरण ने उनमें सुरक्षा की भावना तथा नीति में निरन्तरता उत्पन्न की।

(3) इस एक्ट द्वारा कम्पनी तथा कम्पनी के कर्मचारियों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण स्थापित हो गया। कम्पनी के गवर्नर जनरल, कौंसिल को सदस्य तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटेन के सम्राट के द्वारा की जाती थी। इससे अन्याय एवं अत्याचारों का अन्त हो गया। धीरे-धीरे यह नियंत्रण कठोर होता गया और 1858 ई. में कम्पनी के शासन का ही अन्त कर दी गया। इस प्रकार, इस एक्ट के परिणाम बड़े दूरगामी व स्थायी सिद्ध हुए।

(4) इस एक्ट द्वारा पहली बार भारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों पर कम्पनी शासन का एक व्यवस्थित विधान तैयार किया गया, जिससे शासन की एक स्पष्ट रूपरेखा निश्चित हुई। सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि भविष्य में बनाए जाने वाले सभी संवैधानिक नियमों के लिए अधिनियम ने ढाँचा तैयार कर दिया।

(5) यह प्रथम अवसर था, जबकि ब्रिटिश सरकार ने यूरोप के बाहर भू-क्षेत्र के शासन का उत्तरदायित्व ग्रहण किया। यह एक्ट वास्तव में कम्पनी के भारतीय क्षेत्र में बिना क्राउन के उत्तरदायित्व सम्भाले अच्छी सरकार लाने का एक अच्छा प्रयास था।

(6) इस एक्ट द्वारा कम्पनी के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार निजी व्यापार और उपहार लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं थी।

(7) इस एक्ट द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी का आरम्भ किया गया था, जिसका ब्रिटिश शासनकाल में उत्तरोत्तर विकास होता गया।

(8) इस एक्ट द्वारा भारतीय प्रशासनिक ढाँचे का केन्द्रीकरण की दिशा में प्रथम प्रयास किया गया। बम्बई व मद्रास के गवर्नरों को गवर्नर जनरल के अधीन कर ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया। इस प्रकार, भारत में कम्पनी की विभिन्न शाखाओं पर एक सर्वोच्च सत्ता स्थापित कर दी गई थी।

इस एक्ट के महत्व का वर्णन करते हुए प्रो. कीथ ने लिखा है, इस एक्ट लने कम्पनी के इंग्लैण्ड में स्थिति संस्थाओं के विधान में परिवर्तन किया। भारत सरकार के स्वरूप में कुछ सुधार किए। कम्पनी के समस्त विजित प्रदेशों पर एक शक्ति का नियंत्रण स्थापित किया गया। कम्पनी को किसी अंश तब ब्रिटिश मंत्रिमण्डल की देख-रेख में रखने का प्रयत्न किया गया।

एस.आर. शर्मा ने ठीक ही लिखा है, रेग्यूलेटिंग एक्ट ने भारत में कम्पनी के शासन को उन्नत करने के लिए बिना ताज के महत्वपूर्ण प्रयत्न किया और उसका उत्तरदायित्व प्रत्यक्ष रूप से धारण किया। इसकी सबसे महत्वपूर्ण धारा सुप्रीम कोर्ट की स्थापना (बंगाल में उच्चतम न्यायालय की स्थापना के लिए) थी। इसके द्वारा ताज को समय-समय पर समाचार ज्ञात होते रहते थे, जिसके कारण वह कम्पनी के शासन का निर्णय कर सकता था। इसके द्वारा व्यक्तिगत व्यापार तथा भेंट व उपहार स्वीकार करने पर प्रतिबन्ध लगाए गए। गवर्नर जनरल की कौंसिल को सम्मिलित अधिकार प्राप्त हुए, जो सन् 1781 ई. तक चलते रहे। इसके द्वारा कम्पनी के प्रशासित प्रदेशों में एक उच्च सत्ता की स्थापना हुई। प्रो. सूद ने लिखा है, हमारे देश के वैधानिक इतिहास में इस अधिनियम का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह ब्रिटिश संसद के द्वारा पास किए गए अनेक कानूनों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम कड़ी है, जिसने भारत सरकार के स्वरूप को समय-समय पर ढालने और बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

राजस्थान के भूतपूर्व गवर्नर श्री गुरूमुख निहालसिंह ने अपनी पुस्तक भारत का वैधानिक विकास तथा राष्ट्रीय आन्दोलन में लिखा है, सन् 1773 के एक्ट का वैधानिक महत्व बहुत बड़ा है। इसका कारण यह है कि उसने निश्चित रूप से कम्पनी की राजनीतिक कार्यवाही को स्वीकार किया। दूसरा कारण यह है कि, उस समय तक जो कम्पनी के निजी प्रदेश समझे जाते थे, उनमें सरकारी ढाँचा किस प्रकार का हो, यह निश्चित करने के लिए पार्लियामेंट ने अपने अधिकार पर पहली बार जोर दिया। तीसरा कारण यह है कि, भारतीय सरकार का ढाँचा बदलने के लिए पार्लियामेंट ने जो बहुत-से एक्ट बनाए, उनमें यह सबसे पहला था। सन् 1919 ई. के भारत सरकार के अधिनियम की प्रस्तावना में यह बात अन्तिम रूप और बड़ी दृढ़ता से स्पष्ट की गई कि भारतवासियों के लिए किस प्रकार का विधान उचित और आवश्यक है, उसे निश्चित करने और लागू करने का एकमात्र अधिकार पार्लियामेंट को है।

यह एक्ट ब्रिटिश भारत का प्रथम लिखित संविधान के रूप में था। इसके द्वारा कम्पनी के राजनीतिक लक्ष्य व अस्तित्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था। इतना ही नहीं, इस एक्ट के आधार पर आगे आने वाले कानूनों की रूपरेखा तैयार की गई। संक्षेप में, यह एक्ट कम्पनी के संवैधानिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके द्वारा ऐसी शासन व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ जो, ऐंग्लो-भारतीय प्रशासनिक ढाँचे की आधारशिला बनी।

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