राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन – राजस्थान सामान्य ज्ञान

राजस्थान सामान्य ज्ञान-राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन
भारत में पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है। ऐतिहासिक ग्रन्थों के अनुसार ईसा पूर्व से ही हमें पंचायतों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। उस समय ग्राम पंचायत का प्रमुख ‘ग्रामणी’ से होता था अथर्ववेद में ‘ग्रामणी’ शब्द का उल्लेख मिलता है। यहॉ गठित महासभा विस: कहलाती थी बौद्धकाल में शासन की ईकाई ‘ग्राम’ थी जिसका मुखिया ‘ग्रामयोजक’ होता था जो ग्रामसभा द्वारा चुना जाता था ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा कहा जाता था मौर्यशासन में भी पंचायतों को सुदृढ बनाने में महत्वपूर्ण भूमि का का निर्वहन किया गया मुगलकाल में प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई गांव ही थी जिसका प्रबंध पंचायतों द्वारा किया जाता था तथा जिसका मुखिया मुकद्दम कहलाता था आधुनिक भारत में निर्वाचित एवं जनता के प्रति जवाबदेह स्वायत व्यवस्था का प्रथम बीजारोपण ब्रिटिश शासनकाल में सन् 1667 में मद्रास नगर परिषद में हुआ गवर्नर जनरल व वायसराय लॉर्ड रिपन ( (1880-1884)) ने सर्वप्रथम 1882 ई. में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत एवं न्याय पंचायत का प्रस्ताव कर देश में स्थानीय स्वशासन की ठोस बुनियाद रखी इस कारण रिपन को देश में ‘स्थानीय स्वशासन का पिता’ कहा जाता है। सन् 1919 में ‘माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारो’ के तहत स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया सर्वप्रथम 1919 में बंगाल में ‘स्थानीय सरकार अधिनियम, 1919’ पारित किया गया उसके पश्चात सभी प्रान्तों में अधिनियम पारित कर पंचायतों की स्थापना की गई परन्तु उनमें पंचों का चुनाव जनता द्वारा न होकर सरकार द्वारा मनोनयन किया जाता था राजस्थान में बीकानेर पहली देशी रियासत थी जहां 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम पारित कर ग्राम पंचायतों को वैधानिक दर्जा दिया गया जयपुर रियासत में 1938 में ग्राम पंचायत अधिनियम लागू किया गया था ।

महात्मा गाँधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी पंचायती राज ग्राम स्वराज्य का आधार है। उन्होनें पंचायती राज व्यवस्था का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘ माइ पिक्चर ऑफ फ्री इण्डिया’ में किया गया है। उन्होने गाँवों से सर्वांगीण विकास का सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम ग्राम पंचायतों को बताया था पंचायती राज व्यवस्था के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 40 में भी इसका प्रावधान है। इसके अनुसरण में विभिन्न राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के लिए अधिनियम पारित कर इन्हें साकार रूप प्रदान किया है।
ग्रामीण विकास में जनस‍हभागिता प्राप्त करने एवं अधिकार व शक्तियों के प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण हेतु सलाह देने के उद्देश्य से जनवरी 1957 में श्री बलवंतराय मेहता समिति की स्थापना की गई इस समिति ने 24 नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देते हुए देश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की सिफारिश की गई इन सिफारिशों की क्रियान्वित में 2 अक्टूम्बर 1959 को सर्वप्रथम राजस्थान में नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया इस प्रकार ‘पंचायती राज’ के बापू के स्वप्न को पूरा करने की ओर कदम उठाया गया उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री स्व. श्री मोहनलाल सुखाड़िया लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थक थे राजस्थान के बाद 11 अक्टूम्बर 1959 को आंध्रप्रदेश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समितियां व जिला स्तर पर जिला परिषदें गठित की गई पंचायतों की व्यवस्था के लिए तो पहले से ही राजस्थान पंचायत समिति और जिला परिषद अधिनियम, 1959 बनाया गया।
 2 अक्टूम्बर, 2009 को पंचायती राज प्रणाली के 50 वर्ष पूर्ण हुए हैं अतः इसकी स्वर्ण जयंती है। इस उपलक्ष में नागौर में 02-10-2009 को इसका स्वर्णजयन्ती समारोह मनाया गया ।
1965 के बाद पंचायती राज व्यवस्था में गिरावट आने लगी तथा ये संस्थाएं लगभग निष्प्रभावी सी होने लगी जिसका मुख्य कारण अधिकांश राज्यों में उनके चुनावों का बार बार स्थगित होना उनको अधिकारों का विकेन्द्रीकरण बहुत कम मात्रा में होना तथा वितीय साधनों की कमी होना था ।पंचायती राज व्यवस्था का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए समय समय पर विभिन्न समितियों का गठन किया गया ।
सादिक अली अध्ययन दल पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा 1964 में यह अध्ययन दल गठित किया गया। इसकी महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायत समिति के प्रधान तथा जिला परिषद के प्रमुख का चुनाव इन संस्थाओं के सदस्यों द्वारा किये जाने के स्थान पर वृहतर निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें ग्राम पंचायत के अध्यक्ष तथा सदस्य सभी सम्मिलित हों।
गिरधारीलाल व्यास समिति – 1973 में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति जिसने प्रत्येक क पंचायत के लिए ग्राम सेवक तथा सचिव नियु‍क्त करने तथा पंचायतीराज संस्थाओं को पर्याप्त वितीय संसाधन दिये जाने पर बल दिया।
अशोक मेहता समिति  पंचायतीराज व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए 1977-78 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति ने जिला स्तर और मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश की थी। इन्होने मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का केन्द्र बिन्दु बनाने का सुझाव दिया।
एल.एम. सिंघवी समिति – 1986 में गठित इस समिति द्वारा पंचायतीराज संस्थाओं को स्थानीय शासन की आधारभूत ईकाई के रूप में मान्यता देने, ग्रामसभा को महत्व देने आदि की सिफारिश यह थी कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान के अन्तर्गत सरकार का तृतीय स्तर घोषित किया जाना चाहिए और इस हेतु संविधान में एक नया अध्याय जोड़ा जाना चाहिए 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में नया अध्याय जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को सरकार का तीसरा स्तर प्रदान कर इन्हें संवैधानिक मान्यता कर दी है।

यह भी पढ़ें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here